मुंबई | सोमवार, 31 अगस्त 2026
भारतीय कॉरपोरेट डेट मार्केट में एक नया और महत्वपूर्ण मोड़ देखने को मिल रहा है। देश की प्रमुख सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियां अब अल्पकालिक (Short-term) कर्ज पर निर्भर रहने के बजाय लंबी अवधि (Long-term) के बॉन्ड्स जारी करके पूंजी जुटाने की रणनीति अपना रही हैं। हालिया कारोबारी सत्रों में दिग्गज वित्तीय संस्थानों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) ने 10 साल या उससे अधिक अवधि वाले बॉन्ड के माध्यम से लगभग ₹12,000 करोड़ की बड़ी राशि जुटाई है।
₹12,000 करोड़ की प्रमुख बॉन्ड बिक्री का लेखा-जोखा
हाल ही में हुए इस पूंजी जुटाव अभियान में चार प्रमुख कॉर्पोरेट दिग्गजों ने अग्रणी भूमिका निभाई है:
| कंपनी का नाम | जुटाई गई पूंजी | बॉन्ड की अवधि / प्रकार |
| Bajaj Finance (बजाज फाइनेंस) | ₹5,000 करोड़ | 10 साल |
| Power Finance Corporation (PFC) | ₹2,500 करोड़ | 10 से 15 साल |
| REC Limited (आरईसी) | ₹2,500 करोड़ | 10 से 15 साल |
| Cholamandalam Investment | ₹2,000 करोड़ | 10-वर्षीय कॉल ऑप्शन वाले परपेंचुअल बॉन्ड (Perpetual Bonds) |
कंपनियां क्यों ले रही हैं लंबी अवधि का कर्ज?
अल्पकालिक फंड्स से दीर्घकालिक फंड्स की ओर यह बदलाव मुख्य रूप से निम्नलिखित अनुकूल आर्थिक कारकों के कारण संभव हुआ है:
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संस्थागत निवेशकों की भारी मांग: बीमा कंपनियों (Insurance Companies) और पेंशन फंड्स (Pension Funds) के पास लंबी अवधि की देनदारियां (Long-term Liabilities) होती हैं। इन दायित्वों को संतुलित करने के लिए उन्हें 10 से 15 साल की मैच्योरिटी वाले सुरक्षित और स्थिर निवेश साधनों की जरूरत होती है। कॉरपोरेट बॉन्ड्स उनके लिए एक आदर्श विकल्प बनकर उभरे हैं।
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कम होता यील्ड स्प्रेड (Yield Spread): कम अवधि और लंबी अवधि वाले बॉन्ड्स के ब्याज दर (Yield) का अंतर काफी घट गया है। इस कारण कंपनियों के लिए लंबी अवधि की पूंजी जुटाना लागत के लिहाज से काफी किफायती हो गया है।
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परपेंचुअल बॉन्ड्स का आकर्षण: चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट द्वारा जारी कॉल विकल्प वाले परपेंचुअल बॉन्ड यह दर्शाते हैं कि कंपनियां अपनी बैलेंस शीट को मजबूत करने और कैपिटल एडिक्वेसी (CAR) को बेहतर बनाने के लिए हाइब्रिड डेट इंस्ट्रूमेंट्स का रणनीतिक इस्तेमाल कर रही हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था और कॉरपोरेट डेट मार्केट के लिए इसके मायने
भारतीय ऋण बाजार के विकास के लिहाज से यह रुझान एक सकारात्मक संकेत है:
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बैंकों पर निर्भरता में कमी: कंपनियां अब केवल पारंपरिक बैंक लोन पर निर्भर रहने के बजाय सीधे पूंजी बाजार (Capital Market) से लंबी अवधि का फंड जुटा पा रही हैं।
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लायबिलिटी मैनेजमेंट (ALM): लंबी अवधि के बॉन्ड जारी करने से कंपनियों को एसेट-लायबिलिटी मिसमैच के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।
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बाजार की गहराई (Market Depth): संस्थागत निवेशकों के प्रवेश और लिक्विडिटी बढ़ने से देश का बॉन्ड बाजार अधिक पारदर्शी और सुदृढ़ हो रहा है।
हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस ट्रेंड की निरंतरता भविष्य की ब्याज दरों, वैश्विक व्यापक आर्थिक संकेतकों और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मौद्रिक नीति रुख पर निर्भर करेगी।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1. कॉरपोरेट बॉन्ड (Corporate Bond) क्या होता है?
उत्तर: कॉरपोरेट बॉन्ड एक ऐसा ऋण साधन (Debt Instrument) है जिसके जरिए निजी या सरकारी कंपनियां अपने व्यावसायिक विस्तार या वित्तीय जरूरतों के लिए निवेशकों से ब्याज पर पूंजी जुटाती हैं।
Q2. परपेंचुअल बॉन्ड्स (Perpetual Bonds) क्या होते हैं?
उत्तर: परपेंचुअल बॉन्ड ऐसे निश्चित आय वाले बॉन्ड होते हैं जिनकी कोई निश्चित परिपक्वता तिथि (Maturity Date) नहीं होती। हालांकि, इनमें अक्सर एक निश्चित अवधि (जैसे 10 साल) के बाद कॉल ऑप्शन का विकल्प होता है, जहां जारीकर्ता कंपनी बॉन्ड को वापस खरीद सकती है।
Q3. बीमा और पेंशन फंड लंबी अवधि के बॉन्ड में निवेश क्यों करते हैं?
उत्तर: क्योंकि उनके ग्राहकों की पॉलिसियां और पेंशन प्लान लंबे समय (10–30 साल) के लिए होते हैं। अपने भावी भुगतानों को कवर करने के लिए वे लंबी अवधि के सुरक्षित बॉन्ड्स में निवेश करना पसंद करते हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए लिखा गया है। इसे किसी भी प्रकार की वित्तीय या निवेश सलाह के रूप में न लिया जाए। बॉन्ड बाजार या शेयर बाजार में निवेश करने से पहले अपने पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।
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