बेंगलुरु । मंगलवार, 26 मई 2026
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार द्वारा विधानसभा (MLA) और विधान परिषद (MLC) सदस्यों को विभिन्न बोर्ड और निगमों के अध्यक्ष पद के साथ ‘कैबिनेट का दर्जा’ दिए जाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को कर्नाटक हाईकोर्ट के समक्ष ही पुनरीक्षण याचिका (Review Petition) दायर करने की छूट दी है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख राज्य सरकारों द्वारा राजनीतिक असंतोष को थामने के लिए बांटे जाने वाले ‘कैबिनेट दर्जों’ और उसके वित्तीय बोझ पर एक नई कानूनी बहस को जन्म देता है।
क्या है पूरा मामला और विवाद की जड़?
विवाद की शुरुआत तब हुई जब कर्नाटक की राज्य सरकार ने एक ही अधिसूचना के जरिए बड़े पैमाने पर जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया।
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दर्जा पाने वाले सदस्य: राज्य सरकार ने 26 जनवरी, 2025 को एक आदेश जारी कर 34 जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट का दर्जा दिया, जबकि 8 जनप्रतिनिधियों को यह दर्जा पहले से मिला हुआ था। इस तरह कुल 42 विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को यह विशेष दर्जा प्राप्त हो गया।
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याचिकाकर्ता की आपत्ति: कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कार्यरत सूरी पायला ने इस फैसले को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि विधायकों को बोर्ड या निगम का अध्यक्ष नियुक्त करना समस्या नहीं है, लेकिन उन्हें ‘कैबिनेट दर्जा’ देकर सरकार का अनावश्यक विस्तार किया जा रहा है।
याचिका के मुख्य संवैधानिक और कानूनी तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने कोर्ट के सामने कई महत्वपूर्ण संवैधानिक बिंदु रखे, जो इस प्रकार हैं:
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अनुच्छेद 164(1ए) का उल्लंघन: भारतीय संविधान का यह अनुच्छेद किसी भी राज्य में मंत्रिपरिषद (Ministers) के आकार को सीमित करता है। इसके तहत मंत्रियों की संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती। याचिका में कहा गया कि कैबिनेट का दर्जा देकर सरकार इस सीमा का उल्लंघन कर रही है।
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लाभ का पद (Office of Profit – अनुच्छेद 191): कैबिनेट का दर्जा मिलने के कारण इन 42 जनप्रतिनिधियों को भारी-भरकम वित्तीय लाभ मिलते हैं, जैसे—उच्च वेतन, सरकारी वाहन, मुफ्त ईंधन, बंगला/मकान किराया भत्ता और मेडिकल रीइंबर्समेंट। याचिका के अनुसार, ये सभी लाभ ‘लाभ का पद’ के दायरे में आते हैं, जो किसी भी विधायक को अयोग्य ठहराने का आधार बन सकते हैं।
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अधिनियमों का उल्लंघन: यह नियुक्तियां ‘कर्नाटक विधानमंडल (अयोग्यता निवारण) अधिनियम, 1956’ और ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 10’ की मूल भावना के विपरीत बताई गईं।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका?
इससे पहले 4 मार्च को कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि यह याचिका पूरी तरह से जनहित से प्रेरित नहीं है, बल्कि इसके पीछे याचिकाकर्ता की खुद की कुछ राजनीतिक या प्रशासनिक पदों को पाने की आकांक्षाएं (निहित स्वार्थ) हो सकती हैं।
कानूनी नियमों के अनुसार, जनहित याचिका दायर करने वाले व्यक्ति को कोर्ट के सामने यह स्पष्ट करना होता है कि उस मुकदमे में उसका कोई निजी हित या फायदा तो नहीं छुपा है। हाईकोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता सूरी पायला ने इस बात का पूरा खुलासा नहीं किया था।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: अब आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने इस गंभीर विषय को उतनी गहराई से नहीं लिया जितनी जरूरत थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सीधे आदेश पारित करने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया का पालन करने की बात कही।
जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास हाईकोर्ट में ही पुनरीक्षण याचिका (Review Petition) दायर करने का विकल्प खुला है। इस फैसले के बाद अब यह मामला दोबारा राज्य हाईकोर्ट के पाले में चला गया है, जहां याचिकाकर्ता को अपने ‘निजी हित’ न होने का पुख्ता प्रमाण देना होगा।
Matribhumisamachar


