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TMC में बगावत के बीच ममता बनर्जी ने बंगाल चुनाव में हार के बाद सभी कमेटियां और 16 फ्रंटल संगठन भंग

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कोलकाता । बुधवार, 3 जून 2026

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 (West Bengal Assembly Elections 2026) के अप्रत्याशित नतीजों और तृणमूल कांग्रेस (TMC) की शिकस्त के बाद, राज्य की सियासत में एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया है। पार्टी के भीतर सुलग रही आंतरिक बगावत और गुटबाजी की अटकलों के बीच, टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) ने पार्टी के इतिहास का सबसे कड़ा और बड़ा संगठनात्मक फैसला लिया है।

आधिकारिक घोषणा के अनुसार, ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने राज्य स्तर से लेकर जिला और ब्लॉक स्तर तक की अपनी सभी मुख्य संगठनात्मक कमेटियों और सभी 16 फ्रंटल संगठनों (Frontal Organisations) को तत्काल प्रभाव से भंग (Dissolve) कर दिया है।

चुनाव में हार के बाद टीएमसी में फूटा ‘आंतरिक विद्रोह’

यह ऐतिहासिक कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब पार्टी गठन के बाद से अपने सबसे गंभीर आंतरिक संकट से गुजर रही है। दरअसल, साल 2026 के विधानसभा चुनाव में एक दशक से अधिक पुराने टीएमसी शासन के अंत और चुनावी हार के बाद पार्टी के कई मौजूदा विधायकों और नेताओं ने शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर खुलेआम सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।

संकट तब और गहरा गया जब बागी टीएमसी विधायकों के एक धड़े ने विधानसभा अध्यक्ष (Assembly Speaker) से मुलाकात कर सदन में एक अलग विधायी दल (Separate Legislature Party) के रूप में मान्यता देने की मांग कर डाली। विधायकों के इस कदम को सीधे तौर पर ममता बनर्जी और उनके सिपहसालारों के खिलाफ खुले विद्रोह के रूप में देखा गया। इसी बगावत को कुचलने और संगठन पर अपना नियंत्रण दोबारा स्थापित करने के लिए ममता बनर्जी ने यह ‘मेजर सर्जरी’ की है।

क्या-क्या हुआ भंग?

टीएमसी के आधिकारिक बयान के मुताबिक, पार्टी अपनी कमियों को पहचानने और जमीनी स्तर पर नए सिरे से सुधार के लिए पूरी तरह आत्ममंथन (Introspection) मोड में है। इसके तहत निम्नलिखित इकाइयों को पूरी तरह भंग कर दिया गया है:

  • मुख्य कार्यकारी और कोर कमेटियां (Core Committees)

  • राज्य, जिला और ब्लॉक स्तर की सभी समितियां

  • अनुशासन समिति (Discipline Committee)

  • सभी 16 आनुषांगिक/फ्रंटल संगठन (जिसमें युवा विंग, महिला मोर्चा, छात्र परिषद और श्रमिक संगठन यानी INTTUC शामिल हैं)

पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का कहना है कि बहुत जल्द पूरी संरचना का पुनर्गठन (Reconstitution) किया जाएगा और नए एवं वफादार चेहरों को बड़ी जिम्मेदारियां सौंपी जाएंगी।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय: बचाव या रीसेट मोड?

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि ममता बनर्जी का यह कदम केवल एक “नियमित संगठनात्मक प्रक्रिया” नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर उठ रहे विरोध के सुरों को दबाने की एक सोची-समझी रणनीति है।

मुख्य कारण प्रभाव और रणनीति
बगावत पर लगाम बागी विधायकों और नेताओं को यह साफ संदेश देना कि संगठन पर आज भी ममता बनर्जी की पकड़ अटूट है।
भविष्य की तैयारी चुनावी हार के बाद बिखरे हुए कार्यकर्ताओं में नया जोश भरने के लिए निष्क्रिय नेताओं की छुट्टी करना।
गुटबाजी का अंत पार्टी के विभिन्न वर्गों (युवा, महिला आदि) में समानांतर चल रहे सत्ता केंद्रों को पूरी तरह से समाप्त करना।

बड़ा सुधार (Fact Correction): कई शुरुआती रिपोर्टों में इस कदम को आगामी चुनावों की तैयारी के तौर पर सामान्य बदलाव बताया जा रहा था, लेकिन हकीकत यह है कि यह निर्णय 2026 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को मिली करारी शिकस्त और उसके ठीक बाद उपजे आंतरिक विधायी विद्रोह के सीधे जवाब में लिया गया है।

पार्टी अब सुप्रीम कोर्ट और राजभवन के संवैधानिक घटनाक्रमों पर नजर रखने के साथ-साथ अपने खोए हुए जनाधार को वापस पाने के लिए एक नए रोडमैप पर काम कर रही है। आने वाले दिनों में जब नई कमेटियों के नामों का ऐलान होगा, तब साफ हो पाएगा कि दीदी के इस नए संगठन में किन पुराने वफादारों की वापसी होती है और किन नए चेहरों को तरजीह दी जाती है।

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