लंदन । मंगलवार, 9 जून 2026
पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK/PoK) में राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों के लिए छिड़ा आंदोलन अब एक भीषण रक्तपात और गंभीर मानवीय संकट में बदल चुका है। मुजफ्फराबाद और रावलकोट समेत कई हिस्सों से आ रही अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तानी सुरक्षा बलों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर की गई अंधाधुंध और दमनात्मक कार्रवाई में अब तक 30 से अधिक लोगों के मारे जाने की आशंका है, जबकि सैकड़ों नागरिक गंभीर रूप से हताहत हुए हैं।
इस संवेदनशील और बिगड़ते हालात ने अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तूल पकड़ लिया है। ब्रिटेन में रहने वाले कश्मीरी प्रवासियों की भारी चिंता को देखते हुए 50 से अधिक ब्रिटिश सांसदों ने एकजुट होकर देश की विदेश मंत्री यवेट कूपर को एक आपातकालीन पत्र लिखा है, जिसमें पाकिस्तान सरकार पर राजनयिक दबाव बनाने की मांग की गई है।
ब्रिटिश सांसद इमरान हुसैन ने उठाई आवाज: संचार ब्लैकआउट पर जताई चिंता
ब्रैडफोर्ड ईस्ट से ब्रिटिश सांसद और कश्मीर पर ‘ऑल-पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप’ (APPG) के अध्यक्ष इमरान हुसैन ने इस पूरे मामले में मुखर भूमिका निभाई है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस दमनकारी नीति की कड़े शब्दों में निंदा की।
सांसद इमरान हुसैन ने अपने पत्र और सोशल मीडिया पोस्ट में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं को रेखांकित किया:
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लगातार लॉकडाउन और संचार ब्लैकआउट: उन्होंने बताया कि PoJK में इंटरनेट, मोबाइल नेटवर्क और टेलीफोन सेवाओं को पूरी तरह ठप कर दिया गया है। यह ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ मानवाधिकारों का हनन है ताकि वहां हो रहे अत्याचारों की खबरें बाहर न आ सकें।
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ब्रिटिश कश्मीरी परिवारों में डर का माहौल: ब्रिटेन में एक बहुत बड़ी आबादी कश्मीरी मूल के प्रवासियों की है। हुसैन ने कहा, “कई ब्रिटिश कश्मीरी नागरिक हफ्तों से PoJK में रह रहे अपने बूढ़े माता-पिता और रिश्तेदारों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं। वहां कुछ ब्रिटिश नागरिकों की मनमानी गिरफ्तारियों की खबरें भी आ रही हैं, जिससे परिवारों में भारी डर है।”
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राजनयिक हस्तक्षेप की मांग: सांसदों ने विदेश मंत्री यवेट कूपर से आग्रह किया है कि ब्रिटेन सरकार अपने सभी राजनयिक चैनलों (Diplomatic Channels) का उपयोग करे ताकि पाकिस्तान पर इस नाकेबंदी को हटाने और शांतिपूर्ण बातचीत के जरिए समाधान निकालने का दबाव बनाया जा सके।
रावलकोट में नरसंहार: शोक सभा पर अंधाधुंध फायरिंग
जमीन से आ रही खबरें बेहद विचलित करने वाली हैं। रावलकोट में जम्मू कश्मीर जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के सदस्य पुलिस की कथित गोलीबारी में मारे गए अपने एक साथी के शव के लिए अस्पताल के शवगृह (Mortuary) के बाहर शांतिपूर्ण शोक सभा कर रहे थे। प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय नेताओं के अनुसार, इसी दौरान सुरक्षा बलों ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं।
इस खूनी झड़प में करीब 11 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई और 70 से अधिक लोग घायल हो गए। हालांकि, पुंछ सेक्टर के आयुक्त सरदार वहीद खान और पुलिस प्रमुख लियाकत मलिक का दावा है कि प्रदर्शनकारियों की ओर से की गई फायरिंग में चार पुलिस अधिकारी और एक राहगीर की भी मौत हुई है, जिसके जवाब में पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। पुलिस ने इस दौरान 30 से अधिक लोगों को गिरफ्तार भी किया है।
विवाद की असली जड़: जेएएसी पर प्रतिबंध और आरक्षित सीटों का दुरुपयोग
क्षेत्रीय सरकार ने शुक्रवार को एक तानाशाही कदम उठाते हुए नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन ‘जम्मू कश्मीर जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) को आतंक रोधी कानून के तहत एक प्रतिबंधित समूह घोषित कर दिया।
जेएएसी नेता शौकत मीर ने सरकार पर “स्थानीय लोगों के खुले कत्लेआम” का आरोप लगाया है। इस नए विवाद की मुख्य वजह आगामी 27 जुलाई को होने वाले क्षेत्रीय विधानसभा चुनाव हैं। जेएएसी ने इस चुनाव के खिलाफ पूर्ण बंद (Lockdown) का आह्वान किया है।
विवाद का मुख्य कारण: विधानसभा की कुल 45 सीटों में से 12 सीटें ‘शरणार्थियों’ के लिए आरक्षित हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार इन सीटों का दुरुपयोग करती है और स्थानीय कश्मीरी जनता के बजाय पाकिस्तान के पंजाब और अन्य हिस्सों के अपने पसंदीदा लोगों को यहां से नामित (Nominate) कर देती है, जिससे स्थानीय लोगों का प्रतिनिधित्व खत्म हो रहा है।
निष्पक्ष विश्लेषण
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषकों का मानना है कि इस संकट को केवल कानून-व्यवस्था की स्थिति के रूप में देखना गलत होगा।
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आतंकवाद बनाम नागरिक अधिकार: पाकिस्तानी प्रशासन प्रदर्शनकारियों को ‘अवांछित तत्व’ या ‘आतंकवाद विरोधी कानून’ के तहत दबाने की कोशिश कर रहा है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि यह आंदोलन बुनियादी आर्थिक अधिकारों, आटे-बिजली पर सब्सिडी और राजनीतिक निष्पक्षता को लेकर शुरू हुआ था।
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शरणार्थी सीटों का घालमेल: आरक्षित सीटों पर पाकिस्तान के अन्य प्रांतों के लोगों को बसाना और उन्हें राजनीतिक लाभ देना वहां की जनसांख्यिकी (Demography) को बदलने का एक प्रयास माना जा रहा है, जिसका शांतिपूर्ण विरोध करना नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है।
जब तक इंटरनेट और संचार माध्यम बहाल नहीं होते, तब तक हताहतों का सटीक आंकड़ा मिलना मुश्किल है, लेकिन ब्रिटिश सांसदों के इस हस्तक्षेप ने यह साफ कर दिया है कि पाकिस्तान अब इस दमन को दुनिया की नजरों से छिपा नहीं सकता।
Matribhumisamachar


