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गुजरात हाईकोर्ट ने गोहत्या मामले में क्यों खारिज की मोहम्मद आरिफ की जमानत? जानें अदालत की बड़ी टिप्पणियां

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अहमदाबाद । मंगलवार, 30 जून 2026

गुजरात हाईकोर्ट ने गोवंश के अवैध वध और परिवहन के एक गंभीर मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी मोहम्मद आरिफ अब्दुल रज्जाक समोल की नियमित जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस हसमुख डी. सुथार की एकल पीठ ने मौखिक और लिखित टिप्पणियों में स्पष्ट किया कि गाय भारतीय समाज, विशेषकर हिंदू और जैन समुदायों के लिए बेहद पूजनीय और संरक्षण योग्य है। ऐसे संवेदनशील मामलों में आदतन संलिप्तता न केवल कानून व्यवस्था को चुनौती देती है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचा सकती है।

क्या है पूरा मामला और पुलिस की कार्रवाई?

यह मामला गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता (BNS) और गुजरात पुलिस अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज किया गया था। पुलिस द्वारा की गई एक गुप्त छापेमारी के दौरान आरोपी मोहम्मद आरिफ अब्दुल रज्जाक समोल के घर से ठीक सटे एक खाली भूखंड (प्लास्टिक के थैले) से 23 किलोग्राम गोमांस बरामद किया गया था।

अभियोजन पक्ष (Prosecution) ने अदालत के सामने पुख्ता सबूत रखते हुए बताया कि आरोपी कोई साधारण अपराधी नहीं है, बल्कि वह गोवंश के अवैध वध के लिए बाकायदा गिरोह चलाता है और लोगों को काम पर रखता है। छापेमारी के दौरान पुलिस को देखकर आरोपी के तीन अन्य साथी मौके से फरार हो गए थे, जिनकी गिरफ्तारी पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार अभी भी बाकी है।

कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें

  • आरोपी के वकील की दलील: आरोपी की ओर से अदालत में यह तर्क दिया गया कि चूंकि पुलिस मामले में आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल कर चुकी है, इसलिए अब उसे हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है। इसके साथ ही दलील दी गई कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में ट्रायल (मुकदमा) पूरा होने में लंबा समय लगता है, अतः आरोपी को जमानत का लाभ मिलना चाहिए।

  • सरकारी वकील (अभियोजन) का विरोध: अभियोजन पक्ष ने जमानत का कड़ा विरोध करते हुए कोर्ट को बताया कि आरोपी एक आदतन अपराधी (Habitual Offender) है। उसके खिलाफ पहले से इसी तरह के 8 पुराने आपराधिक मामले दर्ज हैं। कोर्ट को यह भी बताया गया कि पूर्व में जमानत मिलने के बावजूद आरोपी ने अपनी हरकतों में सुधार नहीं किया और दोबारा इसी अपराध में लिप्त पाया गया।

संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 48 और 51(क)(जी) का महत्व

गुजरात हाईकोर्ट ने अपने 12 पन्नों के ऐतिहासिक आदेश में न केवल अपराध की प्रकृति को देखा, बल्कि भारतीय संविधान के मूल्यों का भी गहराई से उल्लेख किया:

  1. अनुच्छेद 48 (Directive Principles): कोर्ट ने याद दिलाया कि राज्य के नीति निदेशक तत्वों के तहत यह सरकार का कर्तव्य है कि वह गायों, बछड़ों तथा अन्य दुग्ध और भारवाही पशुओं के संरक्षण और उनके वध पर रोक लगाने के लिए जरूरी कदम उठाए।

  2. अनुच्छेद 51(क)(जी) (Fundamental Duties): अदालत ने कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य है कि वह वनों, झीलों, नदियों और वन्यजीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और सभी जीवित प्राणियों के प्रति करुणा का भाव रखे।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी: “यद्यपि हमारे मूल कर्तव्य (Fundamental Duties) सीधे तौर पर अदालतों द्वारा लागू कराने योग्य नहीं हैं, फिर भी वे हमारे संविधान की मूल आत्मा और विधायिका (Parliament/Assembly) की मंशा को साफ तौर पर दर्शाते हैं। इन्हीं संवैधानिक प्रावधानों के आलोक में गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम जैसे कड़े कानून बनाए गए हैं।”

सामाजिक सौहार्द और जनभावनाओं पर कोर्ट का रुख

जस्टिस हसमुख डी. सुथार ने अपने आदेश में साफ तौर पर लिखा कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) देखने पर यह स्पष्ट होता है कि आवेदक गोवंश के अवैध वध और उसके अवैध परिवहन से जुड़े अपराधों में लगातार लिप्त रहा है।

अदालत ने कहा, “हम इस कड़वे सच से आंखें नहीं मूंद सकते कि गाय हिंदू और जैन समुदाय सहित भारतीय समाज के बहुत बड़े हिस्से के लिए पूजनीय और संरक्षण योग्य है। ऐसे अपराधों में बार-बार शामिल होना जनभावनाओं को गहरी ठेस पहुंचा सकता है, जिससे स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ सकता है और कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।”

त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) के निर्देश के साथ याचिका खारिज

मामले की गंभीरता, भारी मात्रा में गोमांस की बरामदगी, फरार सह-आरोपियों की स्थिति और आरोपी के लंबे आपराधिक इतिहास को देखते हुए हाईकोर्ट ने उसे जमानत का हकदार नहीं माना।

हालांकि, कोर्ट ने आरोपी के ‘त्वरित सुनवाई के अधिकार’ (Right to Speedy Trial) का सम्मान करते हुए निचली विचारण अदालत (Trial Court) को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे इस मुकदमे का शीघ्र निस्तारण (Expeditious Disposal) करने का प्रयास करें। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष को भी आदेश दिया है कि वह मुख्य गवाहों की गवाही बिना किसी देरी के जल्द से जल्द अदालत के समक्ष सुनिश्चित कराए।

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