कोलकाता । मंगलवार, 7 जुलाई 2026
कलकत्ता हाई कोर्ट ने दहेज प्रताड़ना और इसके कारण होने वाली मौतों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि दहेज प्रताड़ना के चलते आत्महत्या के मामले न तो बहुत दुर्लभ (Rarest of Rare) हैं और न ही ऐसे हर मामले में दोषी को सीधे आजीवन कारावास की सजा देना अनिवार्य है।
न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी और न्यायमूर्ति अपूर्बा सिन्हा राय की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और कानूनी बारीकियों का हवाला देते हुए एक दोषी पति की आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया है।
क्या था पूरा मामला? (जून 2014 की घटना)
यह पूरा मामला अप्रैल 2010 से शुरू होता है, जब सजल पारुई और चयनिका का विवाह हुआ था। शादी के समय वधु पक्ष की ओर से अपनी हैसियत के अनुसार सोने के आभूषण, नकदी और अन्य घरेलू सामान दिए गए थे। लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही पति सजल और उसके परिवार ने और अधिक पैसों की मांग शुरू कर दी। हद तो तब हो गई जब चयनिका पर उसके मायके (पैतृक संपत्ति) के हिस्से पर दबाव बनाया जाने लगा।
बहन की प्रताड़ना को देखते हुए चयनिका के भाई ने अपनी पैतृक जमीन का एक हिस्सा बेचकर उसे पैसे भी दिए। लेकिन ससुराल वालों का लालच कम नहीं हुआ। अंततः जून 2014 में लगातार मिल रहे आर्थिक और मानसिक दबाव के कारण चयनिका ने अपनी नाबालिग बेटी की हत्या करने के बाद खुद भी आत्महत्या कर ली।
निचली अदालत का फैसला बनाम हाई कोर्ट का रुख
इस मामले में निचली अदालत ने पति सजल पारुई को आजीवन कारावास और उसके माता-पिता को साक्ष्य छिपाने व प्रताड़ना के आरोप में 7-7 साल की सजा सुनाई थी। लेकिन हाई कोर्ट ने मामले की समीक्षा के बाद निम्नलिखित बदलाव किए:
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पति की सजा में कटौती: आईपीसी की धारा 304बी (दहेज मृत्यु) के तहत सजल पारुई की दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया, लेकिन उसकी सजा को उम्रकैद से घटाकर 10 साल का सश्रम कारावास कर दिया गया। हालांकि, उस पर लगा जुर्माना बरकरार रहेगा।
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सास-ससुर हुए बरी: पुख्ता सबूतों और साक्ष्यों के अभाव में हाई कोर्ट ने सजल पारुई के माता-पिता को बरी कर दिया।
हाई कोर्ट की 3 सबसे महत्वपूर्ण टिप्पणियां
1. पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना भी ‘दहेज’ है
इस फैसले में कोर्ट ने एक बहुत ही जरूरी कानूनी बिंदु को साफ किया। कई बार लोग सोचते हैं कि केवल नकद या गाड़ी मांगना ही दहेज है। लेकिन अदालत ने कहा:
“यदि पति द्वारा अपनी पत्नी पर इस बात का लगातार दबाव बनाया जाता है कि वह अपने मायके की पैतृक संपत्ति में से अपना हिस्सा लेकर आए, तो यह कृत्य भी पूरी तरह से ‘दहेज की मांग’ (Demand for Dowry) की श्रेणी में ही आएगा।”
2. हर मामले में उम्रकैद अनिवार्य नहीं
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय कानून के तहत धारा 304बी में न्यूनतम सजा 7 वर्ष और अधिकतम आजीवन कारावास है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर केस में अधिकतम सजा ही दी जाए। आजीवन कारावास केवल अत्यंत क्रूर या दुर्लभ से दुर्लभतम परिस्थितियों वाले मामलों में ही दिया जाना चाहिए।
3. आज भी समाज के लिए कलंक है दहेज प्रथा
माननीय अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि देश में दहेज निषेध अधिनियम, 1961 (Dowry Prohibition Act) लागू होने के इतने दशकों बाद भी समाज की मानसिकता नहीं बदली है। आज भी दहेज प्रताड़ना और दहेज के कारण होने वाली अस्वाभाविक मौतें एक गंभीर सामाजिक अपराध के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं।
क्या कहती है आईपीसी की धारा 304बी (दहेज मृत्यु कानून)?
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304बी के तहत कानूनन कुछ धारणाएं (Presumptions) तय की गई हैं:
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यदि किसी महिला की शादी के 7 वर्ष के भीतर अस्वाभाविक परिस्थितियों में (जैसे जलने से, चोट से या आत्महत्या द्वारा) मौत होती है।
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और यह साबित हो जाता है कि मौत से ठीक पहले उसे पति या रिश्तेदारों द्वारा दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था।
ऐसी स्थिति में कानून यह मानकर चलता है कि यह ‘दहेज मृत्यु’ का मामला है और इसकी जिम्मेदारी सीधे आरोपी पक्ष पर आ जाती है।
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