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क्या खानदानी नाम की प्रतिष्ठा भी ‘ट्रेडमार्क’ है? आराध्या बच्चन केस में दिल्ली हाई कोर्ट के वे सवाल, जो बदल सकते हैं देश का कानून

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मुंबई | शुक्रवार, 14 अगस्त 2026
डिजिटल दौर में सोशल मीडिया पर फैलती भ्रामक खबरें (Fake News) और किसी मशहूर हस्ती के नाम का अनधिकृत इस्तेमाल अब सिर्फ मानहानि तक सीमित नहीं रहा है। बॉलीवुड अभिनेता अभिषेक बच्चन की बेटी आराध्या बच्चन से जुड़े पर्सनालिटी राइट्स (Personality Rights) मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कुछ ऐसे बुनियादी और ऐतिहासिक सवाल उठाए हैं, जो भविष्य में डिजिटल निजता, बच्चों की सुरक्षा और बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) के पूरे ढांचे को नया मोड़ दे सकते हैं।
जस्टिस अनूप जे. भंभानी की पीठ ने सुनवाई के दौरान सीधे तौर पर विचार किया कि क्या किसी मशहूर परिवार की विरासत या ‘सरनेम’ को ट्रेडमार्क की तरह कानूनी संरक्षण दिया जा सकता है, और क्या यह प्रतिष्ठा स्वतः ही आने वाली पीढ़ियों को हस्तांतरित होती है?

2023 से शुरू हुआ कानूनी संघर्ष: मामला क्या था?

यह पूरा विवाद साल 2023 में तब शुरू हुआ जब आराध्या बच्चन की ओर से उनके पिता अभिषेक बच्चन ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि यूट्यूब और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर आराध्या के स्वास्थ्य और व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी बेहद संवेदनशील और झूठी खबरें फैलाई जा रही हैं।
कुछ यूट्यूब चैनलों ने तो यहां तक दावे कर दिए थे कि आराध्या गंभीर रूप से बीमार हैं, अस्पताल में भर्ती हैं या उनकी मृत्यु हो चुकी है। कोर्ट ने उस समय सख्त रुख अपनाते हुए ऐसी सभी फर्जी सामग्री को तुरंत हटाने का अंतरिम आदेश दिया था और इंटरनेट से ऐसी भ्रामक सामग्री साफ करने का निर्देश जारी किया था।

हाई कोर्ट के वे 3 बड़े सवाल, जिन्होंने पूरी कानूनी बहस बदल दी

हालिया सुनवाई में अदालत ने मामले की गहराई में जाते हुए कई दूरगामी कानूनी प्रश्न उपस्थित किए हैं:

1. क्या सरनेम और पारिवारिक प्रतिष्ठा ‘ट्रेडमार्क’ हो सकती है?

अदालत ने सवाल उठाया कि क्या किसी बड़े सरनेम (जैसे बच्चन परिवार) की बनी-बनाई साख को ट्रेडमार्क (Trademark) जैसी कानूनी सुरक्षा दी जा सकती है? अगर हां, तो यह सुरक्षा कितनी पीढ़ियों (Generations) तक लागू होगी?

2. Personality Rights की कानूनी सीमाएं क्या हैं?

हाल के वर्षों में अमिताभ बच्चन, अनिल कपूर और रजनीकांत जैसे दिग्गजों ने अपने नाम, आवाज (Voice), चेहरे और AI अवतारों के अवैध उपयोग के खिलाफ कोर्ट का रुख किया है। कोर्ट अब यह तय कर रहा है कि पर्सनालिटी राइट्स का दायरा कहां तक फैलाया जा सकता है और इसका सही हकदार कौन है।

3. फेक न्यूज बनाम IPR और Defamation

क्या इंटरनेट पर किसी सेलिब्रिटी के बारे में झूठी खबरें फैलाकर व्यूज या पैसे कमाना सिर्फ मानहानि (Defamation) है, या इसे Intellectual Property Rights (IPR) का उल्लंघन और Passing Off (दूसरे के नाम का अनुचित लाभ उठाना) माना जाए?

नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा: सेलिब्रिटी फेम से इतर एक बड़ा मुद्दा

यह मामला सिर्फ बॉलीवुड सेलिब्रिटी परिवार की निजता का नहीं है, बल्कि इंटरनेट के दौर में बच्चों (Minors) के अधिकारों से जुड़ा है। अदालत ने माना कि किसी भी बच्चे के खिलाफ ऑनलाइन फेक न्यूज फैलाना उसके मानसिक स्वास्थ्य और सम्मान पर सीधा हमला है।
इस फैसले से भविष्य में यह तय होगा कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम और सामग्री निर्माताओं (Content Creators) पर नाबालिगों से संबंधित जानकारी साझा करने पर कितनी बंदिशें और जवाबदेही तय की जा सकती हैं।

आगे क्या होगा?

दिल्ली हाई कोर्ट ने अभी इन सवालों पर कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। आने वाली सुनवाइयों में कोर्ट जब इन सवालों पर स्थिति साफ करेगा, तो भारत में डिजिटल निजता, पर्सनालिटी राइट्स और फेक न्यूज रोधी कानूनों की नई रूपरेखा तैयार होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: पर्सनालिटी राइट्स (Personality Rights) क्या होते हैं?
पर्सनालिटी राइट्स किसी व्यक्ति को यह अधिकार देते हैं कि कोई भी अन्य व्यक्ति उसकी अनुमति के बिना उसके नाम, तस्वीर, आवाज या पहचान का इस्तेमाल व्यापारिक लाभ के लिए न कर सके।
Q2: आराध्या बच्चन का केस बाकी सेलिब्रिटी मामलों से अलग क्यों है?
क्योंकि इस मामले में पीड़ित एक नाबालिग बच्चा है और मुद्दा सिर्फ नाम के कमर्शियल इस्तेमाल का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य से जुड़ी झूठी और भ्रामक खबरें (Fake News) फैलाने का है।
Q3: क्या भारत में पर्सनालिटी राइट्स के लिए अलग से कोई कानून है?
वर्तमान में भारत में पर्सनालिटी राइट्स के लिए कोई अलग कानून नहीं है; इसे निजता के अधिकार (Right to Privacy), कॉपीराइट और ट्रेडमार्क एक्ट के तहत देखा जाता है।

अस्वीकरण (Disclaimer)

अस्वीकरण: यह लेख केवल शैक्षणिक और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। इसमें व्यक्त की गई कानूनी जानकारी दिल्ली हाई कोर्ट की कार्यवाही और सार्वजनिक मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। किसी भी कानूनी सलाह के लिए कृपया कानूनी विशेषज्ञ से संपर्क करें।
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