नई दिल्ली।
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता पर देश की सर्वोच्च अदालत में कानूनी लड़ाई एक नए दौर में पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई के दौरान मामले को 4 नवंबर 2026 के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं द्वारा नए कानून के कई विवादित प्रावधानों पर तुरंत अंतरिम रोक की मांग के बीच, अदालत का यह फैसला आगामी कानूनी दिशा तय करने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ कर रही है सुनवाई
मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की दो-न्यायाधीशों वाली पीठ कर रही है।
15 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकीलों ने कोर्ट से आग्रह किया कि संशोधन अधिनियम के कुछ प्रावधानों से जमीनी स्तर पर वक्फ संपत्तियों के अधिकार और कानूनी स्वरूप तेजी से बदल रहे हैं। इस पर पीठ ने जल्द सुनवाई के अनुरोध को स्वीकार करते हुए अगली तिथि 4 नवंबर तय की।
याचिकाकर्ताओं की मुख्य चिंताएं और कानूनी दलीलें
संशोधित कानून को चुनौती देने वाली दर्जनों याचिकाओं में कई अहम तकनीकी व कानूनी सवाल उठाए गए हैं:
‘वक्फ बाय यूजर’ और मौखिक वक्फ की मान्यता पर खतरा
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सदियों से चले आ रहे ‘वक्फ बाय यूजर’ (उपयोग के आधार पर वक्फ) तथा मौखिक रूप से स्थापित वक्फ को नए कानून के तहत सीमित या खारिज किया जा रहा है। इससे ऐतिहासिक मस्जिदों, कब्रिस्तानों, और धार्मिक व परोपकारी संपत्तियों की मान्यता और अधिकारों पर सीधा असर पड़ सकता है।
संपत्तियों के स्वरूप में अपरिवर्तनीय बदलाव (Irreversible Changes)
अदालत के समक्ष यह तर्क दिया गया कि जब तक कानून की संवैधानिक वैधता का अंतिम निपटारा नहीं होता, तब तक यदि किसी वक्फ संपत्ति का पंजीकरण रद्द होता है या उसकी कानूनी स्थिति बदलती है, तो बाद में उसे पहले जैसी स्थिति में लाना (Status Quo) लगभग असंभव हो जाएगा।
लिमिटेशन एक्ट (परिसीमा अधिनियम) के प्रभाव
संशोधन अधिनियम में परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) के प्रावधानों के प्रयोग से जुड़े नए नियमों पर भी आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ताओं का मानना है कि इससे वक्फ बोर्डों द्वारा अपनी संपत्तियों पर दावा करने की कानूनी क्षमता सीमित हो जाएगी।
सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश: क्या लागू है और क्या स्थगित?
गौरतलब है कि सितंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के पूरे कानून पर एकमुश्त रोक (Stay) लगाने से साफ इनकार कर दिया था। कोर्ट का मानना था कि संसद द्वारा पारित किसी भी कानून की संवैधानिक वैधता के पक्ष में प्रारंभिक अनुमान (Presumption of Constitutionality) होता है।
हालांकि, संतुलन बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दो प्रमुख विवादित प्रावधानों के संचालन पर अंतरिम रोक लगाई थी:
- मुस्लिम होने की 5 साल की अनिवार्यता: वक्फ बनाने वाले (वाकिफ) के लिए कम से कम 5 वर्षों से इस्लाम का पालन करने संबंधी शर्त पर रोक।
- सरकारी अधिकारियों द्वारा संपत्ति निर्धारण: किसी संपत्ति के ‘सरकारी भूमि’ होने का निर्धारण करने का अधिकार जिला कलेक्टर या सरकारी अधिकारियों को देने संबंधी प्रावधानों के अमल पर रोक।
4 नवंबर 2026 की सुनवाई क्यों है बेहद महत्वपूर्ण?
4 नवंबर 2026 को होने वाली सुनवाई केवल मुख्य याचिकाओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसमें अंतरिम राहत को बढ़ाने या उसमें संशोधन करने की अर्जियों पर भी विचार हो सकता है।
इस मामले में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB), विभिन्न राज्य वक्फ बोर्ड, धार्मिक संगठन और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की याचिकाएं एक साथ सूचीबद्ध हैं। अदालत का कोई भी दिशा-निर्देश देश भर में वक्फ संपत्तियों के प्रशासन, उनके सर्वेक्षण और डिजिटलीकरण की प्रक्रिया को सीधे प्रभावित करेगा।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई कब है?
उत्तर: सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
Q2: इस मामले की सुनवाई कौन–सी बेंच कर रही है?
उत्तर: मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ कर रही है।
Q3: क्या सुप्रीम कोर्ट ने पूरे वक्फ संशोधन कानून पर रोक लगाई है?
उत्तर: नहीं, कोर्ट ने पूरे अधिनियम पर रोक लगाने से मना कर दिया था, लेकिन कुछ विशिष्ट प्रावधानों (जैसे 5 साल मुस्लिम रहने की शर्त और कलेक्टर द्वारा संपत्ति निर्धारण) पर अंतरिम रोक लगाई हुई है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
यह लेख 15 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुई अदालती कार्यवाही और मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। यह किसी भी प्रकार की कानूनी सलाह नहीं है। कानूनी मामलों में अंतिम निर्णय माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों पर ही आधारित होगा।

