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धर्म परिवर्तन के बाद पिछड़ा वर्ग आरक्षण का दावा स्वतः लागू नहीं: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
6 Min Read

नई दिल्ली।

उच्चतम न्यायालय ने धर्म परिवर्तन (Religious Conversion) और आरक्षण के अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्रीचंद्रशेखर की पीठ ने यह साफ कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था को छोड़कर किसी गैर-हिंदू धर्म (जैसे इस्लाम) को अपनाता है, तो वह केवल अपनी पूर्व सामाजिक स्थिति या पूर्व जातिगत पिछड़ेपन के आधार पर नए धर्म में अधिसूचित पिछड़ा वर्ग (Backward Class) आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

अदालत ने तमिलनाडु सरकार की याचिका को खारिज करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें राज्य सरकार के मार्च 2024 के विवादास्पद आदेश को रद्द कर दिया गया था।

 

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फैसले के मुख्य बिंदु और संवैधानिक व्याख्या

पूर्व सामाजिक स्थिति का स्वतः हस्तांतरण संभव नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति का धर्म परिवर्तन से पहले का सामाजिक या जातिगत पिछड़ापन स्वतः नए धर्म की किसी अधिसूचित पिछड़ा वर्ग श्रेणी में स्थानांतरित (Transposed) नहीं किया जा सकता। पूर्व सामाजिक व्यवस्था में सहा गया पिछड़ापन नए धार्मिक ढांचे में आरक्षण का स्वचालित कानूनी अधिकार नहीं बनता।

तमिलनाडु सरकार का 2024 का आदेश रद्द

तमिलनाडु सरकार ने मार्च 2024 में एक आदेश जारी किया था। इसके तहत Backward Class (BC), Most Backward Class (MBC), Denotified Communities और Scheduled Castes (SC) से इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को कुछ परिस्थितियों में Backward Class (Muslim) समुदाय का प्रमाण पत्र जारी करने का प्रावधान किया गया था। हाईकोर्ट द्वारा इसे रद्द किए जाने के बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसे अब अंततः खारिज कर दिया गया है।

अधिसूचित सात मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदाय

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तमिलनाडु राज्य में सात मुस्लिम समुदायों को पिछड़ा वर्ग (BC Muslim) के रूप में अधिसूचित किया गया है:

  • Ansar (अंसार)
  • Dekkani Muslims (दक्कनी मुस्लिम)
  • Dubekula (दुबेकुला)
  • Labbais (लब्बई – जिसमें Rowther और Marakayar शामिल हैं)
  • Mapilla (मपिला)
  • Sheik (शेख)
  • Syed (सैयद)

सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेने मात्र से कोई व्यक्ति स्वतः इन सात विशेष अधिसूचित जातियों/समुदायों का सदस्य नहीं बन जाता।

संविधान के अनुच्छेद 16(4) पर टिप्पणी

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4) (लोक सेवाओं में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) के संदर्भ में पीठ ने कहा कि जब आरक्षण का आधार किसी विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था या समुदाय की सदस्यता से जुड़ा होता है, तो मूल धार्मिक व्यवस्था को छोड़ने के बाद पुराना दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है।

 

अनुसूचित जाति (SC) दर्जा और पुनः धर्म परिवर्तन (Ghar Wapsi) पर स्थिति

SC दर्जे पर संवैधानिक प्रतिबंध

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैरा 3 का उल्लेख करते हुए अदालत ने दोहराया कि वर्तमान कानूनी व्यवस्था के अनुसार केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को मानने वाले व्यक्ति ही अनुसूचित जाति (SC) के रूप में मान्य हैं। अतः गैर-हिंदू धर्म अपनाने पर पूर्व SC दर्जा समाप्त हो जाता है।

दोबारा हिंदू धर्म अपनाने (Re-conversion) पर नियम

यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद पुनः हिंदू धर्म में वापस आता है, तो उसका पुराना आरक्षण दर्जा या सामाजिक दर्जा अपने आप (Automatically) बहाल नहीं होगा। ऐसे मामलों में सक्षम प्राधिकारी को व्यक्ति की पारिवारिक पृष्ठभूमि, सामाजिक स्वीकृति, परिस्थितियों और लागू नियमों की जांच करके स्वतंत्र फैसला लेना होगा।

 

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: क्या कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने पर पुराने SC/OBC कोटे का लाभ ले सकता है?

उत्तर: नहीं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, गैर-हिंदू धर्म अपनाने के बाद पुराना जातिगत या पिछड़ा वर्ग का दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है और नए धर्म में आरक्षण के लिए उसका ट्रांसफर नहीं हो सकता।

Q2: क्या मुस्लिम धर्म अपनाने के बाद सीधे BC (Muslim) का सर्टिफिकेट मिल सकता है?

उत्तर: नहीं, केवल धर्म परिवर्तन करने से कोई व्यक्ति राज्य द्वारा अधिसूचित विशिष्ट मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों का सदस्य नहीं बन जाता।

Q3: कौन–कौन से धर्म के लोग अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण के दायरे में आते हैं?

उत्तर: संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 के तहत केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वाले लोग ही अनुसूचित जाति श्रेणी के हकदार हैं।

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख कानूनी व समाचार संबंधी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत तथ्य सुप्रीम कोर्ट तथा मद्रास हाई कोर्ट के फैसलों व न्यायिक व्याख्याओं पर आधारित हैं। किसी भी कानूनी मामले या आरक्षण संबंधी प्रमाण पत्र के लिए अपने राज्य के संबंधित विभाग या कानूनी विशेषज्ञ से परामर्श लें।

 

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।