मुंबई|
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के लागू होने के एक दशक बाद, भारत में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) को लेकर सवाल बदल चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि क्या कॉर्पोरेट्स सामाजिक कार्यों पर पैसा खर्च कर रहे हैं, बल्कि सवाल यह है कि क्या इस खर्च का लाभ उन अंतिम नागरिकों तक पहुँच रहा है, जिनके लिए इसे डिज़ाइन किया गया था?
सालाना ₹25,000 करोड़ से ₹30,000 करोड़ के भारी-भरकम CSR बजट के बावजूद, ज़मीनी हकीकत अक्सर अधूरी इमारतों, बंद पड़े वॉटर प्लांट्स और कागज़ी आंकड़ों में उलझकर रह जाती है। इस परिदृश्य में, महाराष्ट्र, गोवा, तेलंगाना और गुजरात जैसे राज्य CSR को केवल कानूनी बाध्यता (Compliance) मानने के बजाय नागरिकों के प्रति एक नैतिक एवं सामाजिक कर्तव्य के रूप में देख रहे हैं।
Compliance बनाम Delivery: कहाँ अटक रहा है CSR का लाभ?
भारत में तय सीमा (₹500 करोड़ नेट वर्थ, ₹1,000 करोड़ टर्नओवर या ₹5 करोड़ नेट प्रॉफिट) वाली कंपनियों के लिए पिछले तीन वर्षों के औसत शुद्ध लाभ का 2% सामाजिक गतिविधियों पर खर्च करना अनिवार्य है। हालांकि, मौजूदा तंत्र काफी हद तक ‘स्व-सत्यापन’ (Self-certification) और ‘खुलासे’ (Disclosure) पर टिका हुआ है।
- रखरखाव (Maintenance) की कमी: अक्सर CSR बजट से इमारतें तो बना दी जाती हैं या उपकरण बाँट दिए जाते हैं, लेकिन अगले कुछ वर्षों में उनके रख-रखाव या मरम्मत का कोई वित्तीय प्रावधान नहीं होता।
- वित्तीय वर्ष का दबाव: प्रोजेक्ट्स की योजना ज़मीनी असर के बजाय वित्तीय वर्ष (Financial Year) की समाप्ति को ध्यान में रखकर बनाई जाती है।
- ओवरहेड खर्चों में लीकेज: हालांकि 2021 के संशोधनों के तहत प्रशासनिक खर्च (Administrative Overheads) की सीमा 5% तय की गई है, लेकिन कार्यान्वयन एजेंसियों (NGOs/कंसल्टेंट्स) के स्तर पर होने वाले खर्चों की अस्पष्टता से ज़मीनी मदद का दायरा सिकुड़ जाता है।
राज्यों की नई पहलें: ‘Maha CSR Authority’ और क्षेत्रीय मॉडल
CSR खर्च को वास्तविक सार्वजनिक संपत्तियों (Public Assets) में बदलने के लिए राज्यों ने अब खुद कमान संभालना शुरू कर दिया है:
महाराष्ट्र का अग्रणी कदम
अगस्त 2026 में, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक समर्पित ‘Maha CSR Authority’ बनाने का प्रस्ताव दिया। देश में सबसे अधिक CSR फंड प्राप्त करने वाला राज्य होने के नाते, महाराष्ट्र का लक्ष्य एक ऐसा ‘प्रोजेक्ट बैंक’ तैयार करना है, जो सरकारी प्राथमिकताओं के साथ मेल खाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अथॉरिटी केवल नए प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन नहीं करेगी, बल्कि पुराने बंद पड़े CSR प्रोजेक्ट्स के रखरखाव और संचालन पर ध्यान केंद्रित करेगी।
अन्य राज्यों के मॉडल:
- गोवा: मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत की अध्यक्षता में गठित CSR अथॉरिटी सीधे कॉर्पोरेट प्राथमिकताओं को राज्य की प्राथमिकताओं से जोड़ती है।
- तेलंगाना: राज्य में CSR फंड का दायरा बढ़ाने और कम से कम 50% खर्च स्थानीय स्तर पर सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष ‘CSR Cell’ और समर्पित पोर्टल शुरू किया गया है।
- गुजरात, राजस्थान व आंध्र प्रदेश: इन राज्यों में पहले से ही समर्पित CSR प्राधिकरण और ‘Connect to Andhra’ जैसी पहलें संचालित हैं, जो ज़िला स्तर पर निगरानी सुनिश्चित करती हैं।
राज्य की निगरानी: संतुलन और बीच का रास्ता
राज्य सरकारों की इस सक्रियता से जहाँ एक ओर परियोजनाओं के दोहराव (Duplication) पर रोक लगती है और स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से बजट आवंटित होता है, वहीं कुछ चिंताएँ भी हैं:
- समांतर टैक्स (Parallel Tax) का डर: यदि सरकारें कंपनियों को अपने पसंदीदा प्रोजेक्ट्स पर खर्च करने के लिए मजबूर करेंगी, तो CSR एक स्वायत्त सामाजिक पहल के बजाय सरकारी फंड जैसा लगने लगेगा।
- व्यावहारिक समाधान: सरकारों को ‘संचालक’ (Operator) के बजाय ‘सुविधा प्रदाता’ (Facilitator) के रूप में काम करना चाहिए। राज्य ज़रूरतों का ब्योरा दें, जियो-टैग किए गए सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाएँ और परियोजनाओं का स्वतंत्र ऑडिट (Third-party Audit) कराएँ, जबकि क्रियान्वयन का अधिकार कंपनियों और निष्पादक संस्थाओं के पास ही रहे।
CSR: अहसान नहीं, सार्वजनिक संसाधनों का प्रतिफल
कंपियाँ हवा में काम नहीं करतीं। वे सार्वजनिक सड़कों, पानी, ज़मीन, बिजली और स्थानीय मानव संसाधनों का उपयोग करके लाभ कमाती हैं। औद्योगिक विकास से अक्सर स्थानीय क्षेत्रों में प्रदूषण और संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।
ऐसे में CSR का 2% हिस्सा कोई “दान” या “उपहार” नहीं है; यह सार्वजनिक संसाधनों का उचित प्रतिफल है। यदि किसी गाँव में CSR के तहत बना स्कूल अधूरा पड़ा है, तो यह केवल कागज़ी रिपोर्टिंग में कमी नहीं, बल्कि उस समुदाय से किया गया एक टूटा हुआ वादा है।
इसे प्रभावी बनाने के 6 मुख्य उपाय
- जियो–टैग पोर्टल: राज्य स्तर पर प्रोजेक्ट्स का पारदर्शी और रियल-टाइम डैशबोर्ड।
- माइलस्टोन–बेस्ड फंडिंग: बजट जारी करने की प्रक्रिया को कैलेंडर तारीखों से हटाकर वास्तविक निर्माण प्रगति से जोड़ना।
- थर्ड–पार्टी इम्पैक्ट ऑडिट: बड़े बजट वाले प्रोजेक्ट्स का निष्पक्ष स्वतंत्र मूल्यांकन।
- एजेंसी ओवरहेड कैप: कार्यान्वयन एजेंसियों के प्रशासनिक खर्चों की सीमा तय करना या उन्हें पूरी तरह पारदर्शी बनाना।
- संपत्ति का हस्तांतरण: निर्मित संपत्तियों को पंचायतों या नगर पालिकाओं को सौंपते समय उनके रखरखाव (Maintenance) का फंड सुनिश्चित करना।
- जन–शिकायत निवारण: स्थानीय नागरिकों के लिए बंद या खराब पड़ी CSR परिसंपत्तियों की रिपोर्ट करने की सरल व्यवस्था।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. भारत में CSR किस कानून के तहत अनिवार्य है?
उत्तर: भारत में CSR कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 और अनुसूची VII (Schedule VII) के तहत अनिवार्य है।
Q2. CSR के तहत कंपनियों को कितना खर्च करना होता है?
उत्तर: पात्र कंपनियों को अपने पिछले 3 वित्तीय वर्षों के औसतन शुद्ध लाभ (Net Profit) का कम से कम 2% सामाजिक विकास कार्यों पर खर्च करना होता है।
Q3. CSR में प्रशासनिक खर्चों (Administrative Overheads) की सीमा क्या है?
उत्तर: कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) के 2021 के नियमों के अनुसार, किसी कंपनी के कुल CSR बजट का अधिकतम 5% ही प्रशासनिक और प्रबंधन खर्चों पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
Q4. राज्यों द्वारा बनाई जा रही ‘CSR Authority’ का मुख्य काम क्या है?
उत्तर: यह अथॉरिटी सरकारी प्राथमिकताओं और कंपनियों के CSR फंड के बीच समन्वय स्थापित करती है, प्रोजेक्ट्स का दोहराव रोकती है और संपत्तियों के दीर्घकालिक रखरखाव व ट्रैकिंग की निगरानी करती है।
अस्वीकरण (Disclaimer):
यह लेख केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। इसमें व्यक्त विचार कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) की नीतियों, राज्य सरकारों के प्रस्तावों और CSR कानूनों के विश्लेषणात्मक संदर्भ पर आधारित हैं। इसे कानूनी या वित्तीय सलाह न माना जाए।

