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जाति गणना के बिना कल्याणकारी योजनाएं: क्या ‘अभाव सूचकांक’ बन सकता है भारत का नया रास्ता? भाग 2

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
6 Min Read

नई दिल्ली|

भारत में अक्सर यह बहस छिड़ती है कि सरकारी योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक कैसे पहुंचे। जहां एक तरफ जातिगत जनगणना की मांग उठती है, वहीं दूसरी तरफ नीति निर्माण में यह सवाल आता है कि क्या बिना जाति को मुख्य आधार बनाए भी समाज के सबसे गरीब और वंचित तबके को पहचाना जा सकता है?

इस दिशा में एक नया नीतिगत प्रस्ताव सामने आया है—अभाव सूचकांक (Deprivation Index)। यह प्रस्ताव किसी नए सर्वेक्षण का सुझाव नहीं देता, बल्कि भारत के पास पहले से मौजूद डेटा प्रणालियों और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) को आपस में जोड़कर एक सटीक और गतिशील (dynamic) व्यवस्था बनाने की बात करता है।

तीन–स्तरीय ढांचा: मौजूदा डेटा से अभाव की पहचान

यह मॉडल तीन मजबूत स्तंभों पर टिका है:

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  • पहला स्तर — SECC 2011 की संरचना का उपयोग:

सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) 2011 में इस्तेमाल किए गए ऑटो-एक्लूजन (संपत्ति के आधार पर बाहर करना) और ऑटो-इन्क्लूजन (अत्यंत गरीबों को शामिल करना) के ढांचे को अपनाया जाए। हालांकि, इसमें एक बड़ा बदलाव प्रस्तावित है—SECC के D5 संकेतक (SC/ST परिवार) को हटाकर केवल भौतिक और मापने योग्य संकेतकों (जैसे भूमिहीन होना, कच्चा मकान, साक्षरता की कमी) को ही अभाव का पैमाना बनाया जाए।

  • दूसरा स्तर — नीति आयोग का MPI ढांचा:

नीति आयोग का राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर के 12 स्पष्ट पैमानों पर आधारित है। यह केवल आय को नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन स्तर में कमी को मापता है।

  • तीसरा स्तर — NFHS के जरिए ज़मीनी सत्यापन:

‘नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे’ (NFHS) के व्यापक नमूनों के जरिए यह जांच की जा सकती है कि सरकारी रजिस्टरों में दिख रहा अभाव असल जिंदगी से मेल खाता है या नहीं।

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और रियल–टाइम अपडेट

पुराने सर्वे कुछ ही वर्षों में अप्रासंगिक हो जाते हैं। इस प्रस्ताव की खासियत यह है कि यह जनगणना, PDS (राशन कार्ड), MGNREGA, PM-JAY, UDISE+ और DBT जैसी चालू डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से डेटा को लगातार अपडेट रखने की सुविधा देता है।

डेटा एकीकरण का मॉडल: इसके लिए कोई एक विशाल “मेगा-डेटाबेस” बनाने की आवश्यकता नहीं है। ‘अकाउंट एग्रीगेटर मॉडल’ की तरह, केवल अधिकृत विभाग ही आवश्यकता पड़ने पर उद्देश्य-आधारित और सुरक्षित तरीके से डेटा वेरीफाई कर सकते हैं। इससे गोपनीयता भी बनी रहती है और प्रक्रिया भी तेज़ होती है।

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दो ज़रूरी पूरक उपाय: निगरानी के नए औजार

एक्सक्लूजन गैप (Exclusion Gap):

यह उपाय यह जांचने में मदद करता है कि जिला स्तर पर कितने परिवार योजना के पात्र हैं और उनमें से वास्तव में कितनों को लाभ मिल रहा है। यह छूटे हुए पात्र लोगों की पहचान करने में मदद करता है।

फ्रिक्शन इंडेक्स (Friction Index):

कई बार पात्रता होने के बावजूद लोग योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते। बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन फेल होना, अधूरा e-KYC या कागजी प्रक्रिया में देरी इसके मुख्य कारण होते हैं। फ्रिक्शन इंडेक्स इन प्रशासनिक और तकनीकी रुकावटों को उजागर करता है।

व्यावहारिक चुनौतियाँ

हालांकि यह प्रस्ताव कागज़ पर बेहद प्रभावी दिखता है, लेकिन इसके सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी हैं:

  • इकाई की भिन्नता: आधार कार्ड व्यक्ति की पहचान करता है, जबकि योजनाएं पूरे ‘परिवार’ को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।
  • कानूनी सीमाएं: जनगणना अधिनियम, 1948 व्यक्तिगत विवरण को सीधे लाभार्थी सूची में बदलने पर रोक लगाता है।
  • पारिवारिक असमानता: गरीबी और पोषण की कमी पूरे परिवार में एक समान होने के बजाय महिलाओं या बच्चों में अलग स्तर पर हो सकती है।

 

निष्कर्ष

वस्तुनिष्ठ और वैज्ञानिक मापदंडों के आधार पर तैयार किया गया अभाव सूचकांक भारत में कल्याणकारी योजनाओं के वितरण को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बना सकता है। यह मॉडल तकनीकी सटीकता और सामाजिक सद्भाव को एक साथ लाकर विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का एक मजबूत विकल्प प्रस्तुत करता है।

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: क्या अभाव सूचकांक (Deprivation Index) के लिए नया सर्वेक्षण करना होगा?

उत्तर: नहीं, यह प्रस्ताव किसी नए सर्वे का सुझाव नहीं देता। यह भारत में पहले से मौजूद SECC, MPI, NFHS और DPI के प्रशासनिक डेटा को एकीकृत करने पर आधारित है।

Q2: इस प्रस्ताव में जातिगत डेटा का क्या विकल्प सुझाया गया है?

उत्तर: SECC के D5 (SC/ST) संकेतक के स्थान पर प्रत्यक्ष रूप से मापे जा सकने वाले अभाव के पैमानों—जैसे भूमिहीन होना, शारीरिक श्रम पर निर्भरता और साक्षरता की कमी—को आधार बनाने का सुझाव दिया गया है।

Q3: फ्रिक्शन इंडेक्स (Friction Index) का क्या काम है?

उत्तर: फ्रिक्शन इंडेक्स यह मापता है कि पात्र नागरिकों को तकनीकी या प्रशासनिक कारणों (जैसे e-KYC की समस्या, बायोमेट्रिक विफलता) से योजनाओं का लाभ मिलने में कितनी रुकावट आ रही है।

 

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख एक नीतिगत प्रस्ताव और अकादमिक विश्लेषण पर आधारित एक विचारात्मक (analytical) सामग्री है। इसका उद्देश्य विषय वस्तु को पाठकों के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। यह किसी सरकारी नीति या आधिकारिक अध्यादेश का प्रतिनिधित्व नहीं करता है।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।