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त्रिपुरा विधानसभा के स्पीकर बिस्वा बंधु सेन का 72 साल की उम्र में निधन

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
3 Min Read

अगरतला. त्रिपुरा विधानसभा के अध्यक्ष बिस्वा बंधु सेन का शुक्रवार सुबह 72 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थे और बेंगलुरु के एक निजी अस्पताल में उपचाराधीन थे। 8 अगस्त को त्रिपुरा में उन्हें गंभीर ब्रेन स्ट्रोक आया था, जिसके बाद बेहतर इलाज के लिए उन्हें बेंगलुरु ले जाया गया। उनके निधन से त्रिपुरा की राजनीति में शोक की लहर फैल गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शोक संदेश में कहा कि बिस्वा बंधु सेन को त्रिपुरा के विकास के लिए किए गए प्रयासों और सामाजिक सरोकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए याद किया जाएगा। उन्होंने दिवंगत नेता के परिवार और समर्थकों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना की।

कौन थे बिस्वा बंधु सेन
बिस्वा बंधु सेन का जन्म 23 मई 1953 को हुआ था। उन्होंने अगरतला के महाराजा बीर बिक्रम कॉलेज से 1975 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। 24 मार्च 2023 को उन्होंने त्रिपुरा विधानसभा के अध्यक्ष का पद संभाला था। वे उत्तर त्रिपुरा जिले की धर्मनगर विधानसभा सीट से चार बार विधायक चुने गए। अपने राजनीतिक जीवन में सेन ने लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी के साथ कार्य किया और 2008 तथा 2013 के विधानसभा चुनावों में जीत दर्ज की। वर्ष 2017 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। इसके बाद वे 2018 से 2023 तक त्रिपुरा विधानसभा के उपाध्यक्ष भी रहे। राजनीति में आने से पहले वे 1988 में धर्मनगर नगर पंचायत के उपाध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके थे।

रेलवे स्टेशन पर उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ
8 अगस्त को अगरतला रेलवे स्टेशन पर उन्हें ब्रेन हेमरेज हुआ था। इस दौरान उनके बेंगलुरु में इलाज को लेकर उठे सवालों पर उनके बेटे डॉ. अरिजीत सेन ने स्पष्ट किया था कि इलाज से जुड़ा फैसला परिवार का निजी अधिकार है और बीमार व्यक्ति को राजनीति का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री माणिक साहा ने सेन के निधन को राज्य के लिए अपूरणीय क्षति बताया और शोकाकुल परिवार को इस कठिन समय में संबल देने की कामना की। बिस्वा बंधु सेन के निधन से त्रिपुरा ने एक अनुभवी और समर्पित जननेता को खो दिया है, जिनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा।

साभार : नवभारत टाइम्स

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।