लखनऊ. उत्तर प्रदेश के मैनचेस्टर कहे जाने वाले शहर कानपुर के औद्योगिक गौरव का प्रतीक रही जेके जूट मिल (JK Jute Mill) की संपत्तियों की नीलामी 12 जनवरी 2026 को होने जा रही है। दशकों तक शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही इस मिल की जमीन और मशीनरी अब नए हाथों में जाने को तैयार है।
650 करोड़ रुपये का दांव, दिग्गजों में होड़
इस नीलामी प्रक्रिया पर पूरे प्रदेश के उद्योग जगत की निगाहें टिकी हुई हैं। मिल की संपत्तियों का कुल अनुमानित मूल्य लगभग 650 करोड़ रुपये आंका गया है। जानकारी के अनुसार, देश की छह बड़ी दिग्गज कंपनियां इस रेस में शामिल हैं। माना जा रहा है कि इन कंपनियों के बीच होने वाली बोली से मिल की अंतिम कीमत अनुमानित मूल्य से भी ऊपर जा सकती है।
नीलामी की नौबत क्यों आई?
जेके जूट मिल पिछले कई वर्षों से बंदी की मार झेल रही थी। मिल के बंद होने के बाद से ही यह भारी कर्ज और मजदूरों के करोड़ों रुपये के बकाया भुगतान को लेकर कानूनी विवादों में फंसी रही। इन वित्तीय देनदारियों के निपटारे और मिल परिसर के पुनर्विकास के उद्देश्य से ही प्रशासन और संबंधित प्राधिकरणों ने इसकी संपत्तियों को बेचने का निर्णय लिया है।
विकास की नई उम्मीद
कानपुर के बीचों-बीच स्थित इस बेशकीमती जमीन के बिकने से शहर के बुनियादी ढांचे में बड़े बदलाव की उम्मीद है। नीलामी जीतने वाली कंपनी इस स्थान का उपयोग निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए कर सकती है:
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व्यावसायिक परिसर (Commercial Hubs): शहर के केंद्र में होने के कारण यह मॉल या ऑफिस स्पेस के लिए उपयुक्त है।
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आवासीय परियोजनाएं: हाई-राइज बिल्डिंग्स और टाउनशिप का निर्माण।
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नया औद्योगिक क्लस्टर: आधुनिक तकनीक के साथ किसी नए उद्योग की शुरुआत।
कानपुर की जेके जूट मिल (JK Jute Mill) का इतिहास भारत के औद्योगिक उदय, स्वदेशी आंदोलन और फिर एक औद्योगिक शहर के संघर्ष की कहानी है। यह मिल कभी कानपुर को ‘पूरब का मैनचेस्टर’ बनाने वाले प्रमुख स्तंभों में से एक थी।
जेके जूट मिल के इतिहास के मुख्य पड़ाव
स्थापना और स्वदेशी का सपना (1931)
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संस्थापक: मिल की स्थापना प्रसिद्ध उद्योगपति लाला कमलापत सिंघानिया ने की थी।
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दिनांक: इसकी औपचारिक शुरुआत 7 दिसंबर 1931 को हुई थी।
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उद्देश्य: जेके (जुग्गीलाल कमलापत) समूह ने इसे उस समय स्थापित किया था जब भारत में ब्रिटिश वस्त्रों का बोलबाला था। इसका उद्देश्य स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देना और जूट के उत्पादन में भारत को आत्मनिर्भर बनाना था।
सफलता का स्वर्ण युग (1930 – 1980)
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अपनी स्थापना के कुछ ही समय बाद यह मिल देश की सबसे बड़ी और आधुनिक जूट मिलों में शुमार हो गई।
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यहाँ बनी बोरियों और जूट के सामान की मांग न केवल पूरे भारत में थी, बल्कि विदेशों में भी इसका निर्यात होता था।
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1950 से 1980 के दशक के बीच, जेके ग्रुप भारत का तीसरा सबसे बड़ा औद्योगिक समूह (टाटा और बिड़ला के बाद) बन गया था, जिसमें जेके जूट मिल की बड़ी भूमिका थी।
संकट और मालिकाना हक में बदलाव
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आर्थिक गिरावट: 1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में, बदलती सरकारी नीतियों, प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग और श्रमिक विवादों के कारण मिल की स्थिति बिगड़ने लगी।
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स्वामित्व परिवर्तन: भारी घाटे और विवादों के बाद, जेके समूह ने इसका स्वामित्व छोड़ दिया। 2007 में कोलकाता के सारडा ग्रुप (Sarda Group) ने इसे खरीदा और चलाने का प्रयास किया।
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नाम में बदलाव: 2017 में इसका आधिकारिक नाम बदलकर ‘जियो जूट मिल’ (Jio Jute Mill) करने की कोशिश भी की गई, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह ‘जेके जूट मिल’ के नाम से ही प्रसिद्ध रही।
बंदी और कानूनी संघर्ष (2014 – वर्तमान)
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अंतिम बंदी: बार-बार बंद होने और खुलने के बाद, 8 मार्च 2014 को मिल में उत्पादन पूरी तरह ठप हो गया।
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मजदूरों का बकाया: मिल बंद होने के समय हजारों मजदूर बेरोजगार हो गए। मजदूरों के वेतन, पीएफ और ग्रेच्युटी का लगभग 275 करोड़ रुपये बकाया है, जिसके लिए ‘जेके जूट मजदूर मोर्चा’ ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
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नीलामी का निर्णय: अंततः मामला नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) तक पहुँचा, जहाँ बकाया चुकाने के लिए मिल की संपत्ति नीलाम करने का आदेश दिया गया।
ऐतिहासिक महत्व के कुछ रोचक तथ्य:
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कमला टावर: जेके ग्रुप की सभी मिलों (जिसमें जूट मिल भी शामिल थी) की निगरानी के लिए कानपुर में ‘कमला टावर’ बनाया गया था, जो लंदन के बिग बेन की तर्ज पर बना है।
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रोजगार का केंद्र: अपने चरम पर, इस मिल में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से हजारों परिवार पलते थे। जरीब चौकी और कालपी रोड का इलाका इसी मिल की चहल-पहल से आबाद रहता था।
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