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संघ पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में कार्य कर रहा – रामदत्त चक्रधर जी

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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ग्वालियर. संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त डबरा के पिछोर स्थित कृषि उपज मंडी, कल्याणपुर तिराहा पर आयोजित विराट हिन्दू सम्मेलन में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर जी ने कहा कि संघ पंच परिवर्तन के संकल्प के साथ समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा में कार्य कर रहा है। सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्व बोध, नागरिक शिष्टाचार और कुटुंब प्रबोधन जैसे विषयों के माध्यम से समाज को जागरूक और संगठित करने के लिए देशभर में विविध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि धूमेश्वर धाम भितरवार के महामंडलेश्वर स्वामी अनिरुद्धवन महाराज जी रहे, जबकि विशेष अतिथि के रूप में कृष्णा रावत जी उपस्थित थीं।

सह सरकार्यवाह जी ने कहा कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने गहन चिंतन-मनन के बाद 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। उनका स्पष्ट विचार था कि सबसे पहले आत्मविस्मृत हिन्दू समाज में आत्मबोध जगाना आवश्यक है। जब तक हिन्दू समाज संगठित, संस्कारित और परमार्थी नहीं बनेगा, तब तक भारत पुनः विश्वगुरु नहीं बन सकता।

उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था जब हिन्दू कहलाने में भी लोगों को हीन भावना होती थी, लेकिन आज समाज गर्व के साथ अपनी पहचान स्वीकार कर रहा है। पहले हिन्दू समाज केवल अपने और अपने परिवार तक सीमित सोच रखता था, लेकिन अब व्यापक सामाजिक जागृति आई है।

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कोरोना काल का उदाहरण देते हुए कहा कि उस कठिन समय में जब कई बार रिश्तेदार और पड़ोसी भी साथ नहीं दे पाए, तब संघ के स्वयंसेवकों ने अपने जीवन की परवाह किए बिना पीड़ितों की सेवा की। स्वयंसेवकों ने न केवल विधि-विधान से अंतिम संस्कार किए, बल्कि मृतकों को उनके परिजनों तक पहुंचाने का भी कार्य किया।

उन्होंने भारत-पाक युद्ध और भारत-चीन युद्ध का उल्लेख करते हुए कहा कि संकट काल में संघ के स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वयंसेवकों ने गोला-बारूद सेना तक पहुंचाने में अपने प्राणों की आहुति भी दी।

सह सरकार्यवाह जी ने हिन्दू समाज के संगठित होने, संस्कारवान बनने और कर्तव्यबोध विकसित करने पर विशेष बल दिया। अन्य वक्ताओं ने भी समरस और संगठित समाज के माध्यम से न केवल देश बल्कि विश्व को दिशा देने का आह्वान किया।

गणेश वंदना और वनवासी नृत्य बने आकर्षण

सम्मेलन में हजारों लोगों की उपस्थिति के बीच गणेश वंदना और वनवासी नृत्य विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। कार्यक्रम के प्रारंभ में पिछोर के दोनों छोर से दो भव्य कलश यात्राएं निकाली गईं, जो कार्यक्रम स्थल पर पहुंचकर संपन्न हुईं। इसके पश्चात 21 कुंडीय यज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें भारत माता और गौ माता का पूजन भी किया गया।

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साभार : विश्व संवाद केंद्र

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।