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BMC चुनाव के बाद ‘ठाकरे बनाम ठाकरे’: क्या 1 सीट के लिए टूटेगा उद्धव-राज का साथ?

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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मुंबई. दो दशक की कड़वाहट भुलाकर हाथ मिलाने वाले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के बीच का राजनीतिक मेल-मिलाप अब गहरे संकट में नजर आ रहा है। बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) चुनाव के नतीजे आए अभी एक महीना ही बीता है कि ‘बड़े भाई’ और ‘छोटे भाई’ के बीच मनोनीत पार्षदों (Nominated Corporators) के कोटे को लेकर खींचतान शुरू हो गई है।

विवाद की मुख्य वजह: 10 सीटों का गणित

हालिया चुनाव परिणामों के बाद, BMC में 10 मनोनीत पार्षदों की नियुक्ति होनी है। संख्याबल के हिसाब से:

  • शिवसेना (UBT): 65 सीटें जीतने के कारण इनके पास 3 सीटें मनोनीत करने का अधिकार है।

  • MNS: राज ठाकरे की पार्टी ने मात्र 6 सीटें जीती हैं, जिससे तकनीकी रूप से उनका अपना कोई कोटा नहीं बनता।

राज ठाकरे की मांग: सूत्रों के अनुसार, राज ठाकरे ने गठबंधन धर्म का हवाला देते हुए उद्धव के कोटे की 3 सीटों में से 1 सीट मांगी थी। उद्धव ठाकरे द्वारा इस मांग को ठुकराए जाने के बाद से ही दोनों खेमों में दरार दिखने लगी है।

सोशल मीडिया पर ‘इशारों’ की जंग

गठबंधन में मची इस खलबली का असर सोशल मीडिया पर साफ दिख रहा है। MNS के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने रहस्यमयी और तंज भरे पोस्ट किए हैं:

“जब दिल में प्यार ही नहीं है, तो साथ चलने का दिखावा क्यों?”

हालांकि, उद्धव कैंप के प्रवक्ता संजय राउत और अन्य नेताओं ने इसे “पारिवारिक मामला” बताते हुए खारिज किया है, लेकिन अंदरूनी कलह छिप नहीं पा रही है।

राज-शिंदे की मुलाकात ने बढ़ाई धड़कनें

इस विवाद के बीच सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब राज ठाकरे ने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से उनके आवास ‘नंदनवन’ में मुलाकात की।

  • आधिकारिक पक्ष: MNS ने इसे ‘नागरिक मुद्दों’ पर एक सामान्य शिष्टाचार भेंट बताया।

  • राजनीतिक गलियारा: जानकारों का मानना है कि यह उद्धव ठाकरे पर दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति है। यदि उद्धव सीट नहीं देते, तो राज ठाकरे ‘महायुति’ (BJP-शिंदे गुट) के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाकर उद्धव के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।

आगे क्या?

बीजेपी पहले ही 89 सीटें जीतकर बीएमसी में ‘किंगमेकर’ की भूमिका में है। ऐसे में अगर ठाकरे भाइयों का यह गठबंधन टूटता है, तो इसका सीधा फायदा सत्ताधारी दल को होगा। फिलहाल सबकी नजरें राज ठाकरे के अगले कदम पर हैं।

सम्बंधित खबर पढ़ें: महाराष्ट्र राजनीति: क्या फिर एक होंगे उद्धव और राज?

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।