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राणा अयूब की बढ़ी मुश्किलें: विवादित पोस्ट पर दिल्ली हाई कोर्ट सख्त, केंद्र और ‘X’ से 48 घंटे में मांगा जवाब

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नई दिल्ली | बुधवार, 8 अप्रैल 2026

पत्रकार राणा अयूब के पुराने सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर कानूनी शिकंजा कसता जा रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अयूब के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने उनके कुछ पोस्ट्स को प्रथम दृष्टया “अत्यधिक अपमानजनक, भड़काऊ और सांप्रदायिक” करार दिया है। न्यायमूर्ति पुरूषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) को नोटिस जारी किया है।

क्या है पूरा विवाद?

यह मामला अधिवक्ता और सनातन धर्म की अनुयायी अमिता सचदेवा द्वारा दायर एक याचिका से संबंधित है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राणा अयूब ने साल 2013 से 2017 के बीच ‘X’ पर कई ऐसे पोस्ट किए, जिनसे न केवल हिंदू देवी-देवताओं का अपमान हुआ, बल्कि वीर सावरकर जैसी ऐतिहासिक हस्तियों और भारतीय सेना की छवि को भी धूमिल करने की कोशिश की गई।

विवाद के मुख्य बिंदु:

  • देवी-देवताओं पर टिप्पणी: याचिकाकर्ता का दावा है कि पोस्ट्स में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली भाषा का प्रयोग किया गया।

  • सेना और सावरकर: याचिका में कहा गया कि अयूब ने वीर सावरकर के खिलाफ अपमानजनक शब्दावली का इस्तेमाल किया और भारतीय सेना पर निराधार आरोप लगाए।

  • सांप्रदायिक सौहार्द: अदालत ने माना कि ये पोस्ट सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने की क्षमता रखते हैं।

अदालत की सख्त टिप्पणी और निर्देश

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कौरव ने कहा कि यह मामला “त्वरित विचार” के योग्य है। अदालत ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह विवादित पोस्ट्स से संबंधित सभी दस्तावेज और लिंक तुरंत ‘X’ कॉर्पोरेशन को भेजें ताकि उन पर उचित तकनीकी कार्रवाई की जा सके।

“प्रतिवादी संख्या 4 (राणा अयूब) द्वारा किए गए ट्वीट अत्यधिक अपमानजनक और सांप्रदायिक हैं। इनके खिलाफ पहले ही सक्षम न्यायालय के आदेश पर FIR दर्ज करने के निर्देश दिए जा चुके हैं।” — दिल्ली हाई कोर्ट

अब आगे क्या होगा?

अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 को तय की है। तब तक सभी संबंधित पक्षों को अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा। इससे पहले निचली अदालत (साकेत कोर्ट) भी इस मामले में पुलिस को FIR दर्ज कर निष्पक्ष जांच के आदेश दे चुकी है।

अभिव्यक्ति की आजादी या उल्लंघन?

यह मामला एक बार फिर सोशल मीडिया पर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ की सीमाओं को लेकर बहस छेड़ चुका है। जहां एक पक्ष इसे प्रेस की आजादी पर हमला बता रहा है, वहीं याचिकाकर्ता का तर्क है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी धर्म या देश की सुरक्षा एजेंसियों का अपमान करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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