आमतौर पर यह माना जाता है कि 15 अगस्त 1947 को भारत को मिली आज़ादी केवल चरखा, सत्याग्रह और शांतिपूर्ण आंदोलनों की देन थी। लेकिन इतिहास का दूसरा पक्ष यह भी बताता है कि सशस्त्र क्रांति, सैन्य असंतोष और विद्रोह ने ब्रिटिश शासन को निर्णायक रूप से कमजोर किया। 1. …
Read More »‘आज़ाद ही रहेंगे’: 15 कोड़ों से लेकर 15 गोलियों तक, रोंगटे खड़े कर देगी चंद्रशेखर आज़ाद की ये शौर्य गाथा
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में चंद्रशेखर आज़ाद ऐसा नाम हैं, जो साहस, अडिग संकल्प और सर्वोच्च बलिदान का प्रतीक बन चुका है। उनका जीवन किसी रोमांचक फिल्मी पटकथा से कम नहीं था—और उसका सबसे निर्णायक दृश्य है अल्फ्रेड पार्क की वह अंतिम घड़ी, जहाँ उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए …
Read More »असहयोग आंदोलन से मोहभंग: वह मोड़ जिसने भगत सिंह को क्रांतिकारी बनाया
बलिदानी भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन विरले नायकों में हैं, जिन्हें केवल क्रांतिकारी कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे एक प्रखर विचारक, तर्कशील लेखक और दूरदर्शी युवा थे, जिनका “इंकलाब ज़िंदाबाद” केवल नारा नहीं, बल्कि अन्याय, शोषण और गुलामी के विरुद्ध एक संपूर्ण दर्शन था। …
Read More »सुभाष चंद्र बोस: जब देशप्रेम के आगे छोटी पड़ गई अंग्रेजों की सबसे बड़ी नौकरी!
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही हुए हैं, जिन्होंने निजी वैभव, सामाजिक प्रतिष्ठा और सत्ता के शिखर को स्वेच्छा से त्याग दिया हो। सुभाष चंद्र बोस ऐसे ही क्रांतिकारी राष्ट्रनायक थे, जिनकी आत्मा भारत की गुलामी से व्यथित थी। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण …
Read More »गांधी का ‘हिंद स्वराज’ बनाम सावरकर का ‘हिंदुत्व’: भारत की मुक्ति, राष्ट्र और पहचान की दो वैचारिक धाराएँ
भारत की स्वतंत्रता संग्राम की वैचारिक भूमि पर दो शक्तिशाली विचारधाराएँ उभरीं— महात्मा गांधी का ‘हिंद स्वराज’ (1909) और वीर सावरकर का ‘हिंदुत्व’ (1923)। दोनों ही भारत की मुक्ति, अस्मिता (Identity) और राष्ट्र-निर्माण की बात करते हैं, लेकिन उनके रास्ते, साधन और परिभाषाएँ मूलतः भिन्न हैं। जहाँ गांधी भारत की आत्मा …
Read More »नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सावरकर की ऐतिहासिक मुलाकात: आज़ाद हिंद फौज के निर्माण की रणनीतिक नींव
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जो भले ही लंबे समय तक सार्वजनिक विमर्श से दूर रही हों, लेकिन उनका प्रभाव राष्ट्र की नियति तय करता है। ऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना थी नेताजी सुभाष चंद्र बोस और विनायक दामोदर सावरकर की 22 जून 1940 …
Read More »त्रिपुरी अधिवेशन 1939: जब गांधीजी की ‘हार’ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इस्तीफे पर मजबूर किया
यह भारतीय राजनीति के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद अध्याय है। 1939 का त्रिपुरी अधिवेशन (Tripuri Session) वह मोड़ था जहां ‘अहिंसा’ और ‘सशस्त्र क्रांति’ की विचारधाराएं आमने-सामने थीं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 1939 का वर्ष वैचारिक युद्ध का वर्ष था। एक ओर महात्मा गांधी की …
Read More »वीर सावरकर का अखंड भारत: एक राष्ट्र, एक संस्कृति और अटूट संकल्प
विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें दुनिया ‘वीर सावरकर’ के नाम से जानती है, केवल एक क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि एक महान दूरदर्शी और विचारक भी थे। उनके विचारों के केंद्र में एक ही संकल्प था—अखंड भारत। उनके लिए भारत केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक …
Read More »ऐतिहासिक क्षण: नेताजी ने पोर्ट ब्लेयर में फहराया भारत की स्वतंत्रता का तिरंगा
पोर्ट ब्लेयर (अंडमान), 30 दिसंबर 1943 आज का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। ‘आजाद हिंद फौज’ के सर्वोच्च कमांडर नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज पोर्ट ब्लेयर के ‘जिमखाना मैदान’ (अब नेताजी स्टेडियम) में आधिकारिक रूप से भारतीय स्वतंत्रता का झंडा फहराया। इस …
Read More »भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक बड़े अध्याय से लेकर संविधान निर्माण तक का इतिहास
भारत : 1885 से 1950 (इतिहास पर एक दृष्टि) – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव और भी कई अवसरों पर इतिहास के पुनर्लेखन पर जोर दिया है। तब से मेरे मन में एक प्रश्न है कि इसकी आवश्यकता मोदी जी को क्यों लगती है? हमारा इतिहास किसने …
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