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त्रिपुरी अधिवेशन 1939: जब गांधीजी की ‘हार’ ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इस्तीफे पर मजबूर किया

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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यह भारतीय राजनीति के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद अध्याय है। 1939 का त्रिपुरी अधिवेशन (Tripuri Session) वह मोड़ था जहां ‘अहिंसा’ और ‘सशस्त्र क्रांति’ की विचारधाराएं आमने-सामने थीं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 1939 का वर्ष वैचारिक युद्ध का वर्ष था। एक ओर महात्मा गांधी की अहिंसक और क्रमिक सुधार की नीति थी, तो दूसरी ओर सुभाष चंद्र बोस का वह राष्ट्रवाद था जो द्वितीय विश्व युद्ध की आहट के बीच अंग्रेजों पर निर्णायक प्रहार करना चाहता था।

1. हरिपुरा से त्रिपुरी: संघर्ष की शुरुआत

1938 के हरिपुरा अधिवेशन में नेताजी निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए थे। लेकिन 1939 में जब उन्होंने दोबारा अध्यक्ष बनने की इच्छा जताई, तो गांधीजी इसके पक्ष में नहीं थे। गांधीजी का मानना था कि कांग्रेस का अध्यक्ष हर साल बदलना चाहिए, जबकि सुभाष बाबू का तर्क था कि विश्व युद्ध के मंडराते बादलों के बीच देश को एक दृढ़ और निरंतर नेतृत्व की आवश्यकता है।

2. वह ऐतिहासिक चुनाव: सुभाष बनाम पट्टाभी

गांधीजी ने नेताजी के खिलाफ पट्टाभी सीतारमैया को अपना उम्मीदवार घोषित किया। यह चुनाव केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं के बीच था।

  • चुनाव परिणाम: सुभाष चंद्र बोस को 1580 वोट मिले, जबकि सीतारमैया को 1377।

  • गांधीजी की प्रतिक्रिया: हार के बाद गांधीजी ने प्रसिद्ध बयान दिया— “पट्टाभी की हार मेरी हार है।” इस एक वाक्य ने कांग्रेस के भीतर एक भावनात्मक और राजनीतिक भूचाल ला दिया।

3. राजनीतिक महत्वाकांक्षा या वैचारिक मतभेद?

इतिहासकार इस इस्तीफे के पीछे कई प्रमुख कारण मानते हैं:

  • वर्किंग कमेटी का असहयोग: गांधीजी के प्रभाव में कांग्रेस की वर्किंग कमेटी के 15 में से 12 सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया। सुभाष बाबू अध्यक्ष तो थे, लेकिन उनके पास काम करने के लिए टीम नहीं बची थी।

  • पंत प्रस्ताव (Pant Resolution): गोविंद वल्लभ पंत ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें कहा गया कि अध्यक्ष को अपनी कमेटी ‘गांधीजी की इच्छा’ के अनुसार बनानी होगी। इसने नेताजी की शक्तियों को पूरी तरह सीमित कर दिया।

  • विश्व युद्ध पर नजरिया: नेताजी चाहते थे कि भारत अंग्रेजों को 6 महीने का अल्टीमेटम दे और फिर राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़े। गांधीजी उस समय अंग्रेजों को मुश्किल में डालकर फायदा उठाने के पक्ष में नहीं थे।

4. इस्तीफा और फॉरवर्ड ब्लॉक का जन्म

जब नेताजी को लगा कि गांधीजी के समर्थन के बिना वे कांग्रेस को अपनी योजना के अनुसार नहीं चला पाएंगे, तो उन्होंने 29 अप्रैल 1939 को इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह डॉ. राजेंद्र प्रसाद को अध्यक्ष बनाया गया।

कांग्रेस छोड़ने के बाद, उन्होंने उसी वर्ष ‘ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना की ताकि वे अपनी क्रांतिकारी विचारधारा को आगे बढ़ा सकें।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।