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दुर्गा भाभी – एक आयरन लेडी और महान क्रांतिकारी

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– सारांश कनौजिया

7 अक्टूबर 1907 को उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले के शहजादपुर ग्राम में पं. बांके बिहारी के परिवार में एक बच्ची दुर्गावती देवी ने जन्म लिया, जो बाद में एक महान क्रांतिकारी दुर्गा भाभी बनीं। उनके संघर्षपूर्ण जीवन के कारण उन्हें आयरन लेडी भी कहा जाता है। उनके पिता प्रयागराज (इलाहबाद) के कलेक्ट्रेट में नाजिर थे। उनके दादा पं. शिवशंकर शहजादपुर में जमींदार थे। पं. शिवशंकर, दुर्गा की हर छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखते थे। दूसरे अर्थों में दुर्गा को वही सुख सुविधाएं बचपन से मिलीं, जो किसी लड़के को उस समय मिलती थीं।

उस समय कम आयु में ही बच्चियों का विवाह हो जाया करता था। दुर्गा का विवाह भी मात्र 11 वर्ष की आयु में भगवती चरण वोहरा के साथ हुआ। उनके ससुर शिवचरण अंग्रेज सरकार में रेलवे के उच्च पद पर कार्यरत थे। अंग्रेज उनके ससुर को राय साहब कहते थे। इसके बाद भी उनके पति भगवती चरण ने क्रांति का रास्ता अपनाया। 1920 में पिता की मृत्यु के बाद भगवती चरण अपने क्रांतिकारी अभियानों में और मुखर होकर भाग लेने लगे। एक छाया की तरह अपने पति का सहयोग करने के कारण दुर्गावती को सभी दुर्गा भाभी के नाम से पुकारने लगे।

भगवती चरण के इन कार्यों का असर उनकी पत्नी दुर्गा पर भी पड़ा। वो अपने पति के साथ मिलकर हर क्रांतिकारी गतिविधि में बढ़-चढ़कर भाग लेती थीं। क्रांतिकारी गतिविधियों में पति का सहयोग मिलने के कारण ससुर की मृत्यु के बाद अब वो भी देश के लिए कार्य करने को स्वतंत्र थीं। 1923 में दुर्गा भाभी ने प्रभाकर की डिग्री प्राप्त की। मार्च 1926 में भगवती चरण वोहरा, भगत सिंह, रामचंद्र कपूर और दुर्गा ने मिलकर नौजवान भारत सभा की स्थापना की। भगवती चरण इस संगठन के प्रचार सचिव थे। इस संगठन से हजारों नौजवान जुड़े और उन्होंने विभिन्न क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया।

दुर्गा को अपने पति का पूरा सहयोग मिलने के कारण अब वो अन्य क्रांतिकारियों का भी सहयोग करती थीं। जैसे लाला लाजपत राय के बलिदान का बदला अंग्रेजों से लेने के लिए क्रांतिकारियों ने 10 दिसंबर 1928 को लाहौर में एक बैठक का आयोजन किया था। इसकी अध्यक्षता दुर्गा भाभी ने ही की थी। कुलदीप नैयर अपनी किताब ‘विदाउट फ़ियर, द लाइफ़ एंड ट्रायल ऑफ़ भगत सिंह’ में लिखते हैं, “दुर्गा देवी ने सबसे पूछा कि आप में से कौन स्कॉट की हत्या का बीड़ा उठा सकता है? भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू और चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने हाथ उठा दिए। सुखदेव अकेले यह कार्य करना चाहते थे, लेकिन उनकी सहायता के लिए चार और क्रांतिकारियों भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आज़ाद और जयगोपाल को चुना गया।” दरअसल पुलिस अधीक्षक जेम्स. ए. स्कॉट ही वो अधिकारी था, जिसने लाला लाजपत राय सहित साइमन कमीशन का विरोध कर रहे अन्य देशभक्तों पर लाठीचार्ज का आदेश दिया था, जिसमें घायल होने के कारण लाला जी का बलिदान हुआ।

लाला लाजपत राय के बलिदान का बदला लेने के लिए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने तत्कालीन ब्रिटिश सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सॉन्डर्स की हत्या 17 दिसंबर 1928 को कर दी थी। इस हत्या के बाद अंग्रेजों से बच निकलने के लिए भगत सिंह और राजगुरु, दुर्गा भाभी के पास आये थे और उन्होंने इन क्रांतिकारियों की अंग्रेजों से छुपकर निकलने में सहायता की थी। भगत सिंह और दुर्गा भाभी ने किसी दंपत्ति की तरह कलकत्ता मेल में सवार होकर यात्रा की। इस यात्रा के लिए भगत सिंह का नाम रणजीत और दुर्गा भाभी का नाम सुजाता रखा गया था। भगत सिंह अविवाहित थे, इसलिए किसी को शक नहीं हुआ कि वो किसी महिला के साथ भी हो सकते हैं। इस प्रकरण की पृष्ठभूमि के बारे में मलविंदर जीत सिंह वड़ाइच अपनी किताब ‘भगत सिंह, द एटर्नल रेबेल’ में लिखते हैं, “…..दुर्गा भाभी ने मुझे बताया था कि अगले दिन सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु के साथ मेरे घर आए। तब तक मैंने भगत सिंह को बालों के साथ देखा था। सुखदेव ने मुझसे पूछा क्या तुम हम लोगों को पहचानती हो? राजगुरु से तो मैं पहले कभी मिली नहीं थी इसलिए मैंने मना कर दिया। तब सुखदेव ने शरारती मुस्कान के साथ भगत सिंह की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, ये वही ‘जट्टू’ है जो संतरे खाने का शौकीन है। ये सुनते ही भगत सिंह ने ज़ोर का ठहाका लगाया। उनके ठहाके से मैंने पहचान लिया कि ये तो भगत सिंह हैं। भगत सिंह ने हँसते हुए कहा, “भाभी, जब तुम मुझे नहीं पहचान पाई तो अंग्रेज़ों की पुलिस भी मुझे नहीं पहचान सकेगी।”

8 अप्रैल 1929 को जब भगत सिंह ने अपने साथियों की सहायता से एसेंबली के मुख्य हॉल की खाली जगह पर बम विस्फोट किया था। तो उससे पहले दुर्गा भाभी ने उनका अपने खून से तिलक कर रवाना किया था। उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों को कानूनी सहायता मिल सके इसके लिए अपने जेवर तक बेच डाले थे। रावी नदी के तट पर 28 मई 1930 को साथियों के साथ बम का परीक्षण करते समय भगवती चरण का बलिदान हो गए। पति का बलिदान भी दुर्गा भाभी को कमजोर नहीं कर पाया। बल्कि अब वो क्रांतिकारी गतिविधियों का स्वयं नेतृत्व करने लगीं। 9 अक्टूबर 1930 को दुर्गा भाभी ने गवर्नर हैली पर गोली चलाई, लेकिन वो बच गया। उनकी गोली से एक सैन्य अधिकारी टेलर जरुर घायल हो गया। इसके अलावा दुर्गा भाभी ने मुंबई पुलिस कमिश्नर को भी निशाना बनाने का प्रयास किया था। दुर्गा भाभी क्रांतिकारी साथियों के लिए पिस्तौल उपलब्ध कराने का काम करती थीं। 27 फरवरी 1931 को बलिदान होते समय चंद्रशेखर आजाद ने जिस पिस्तौल का प्रयोग किया था, उसे दुर्गा भाभी ने ही उन तक पहुंचया था।

सत्यनारायण सिंह अपनी किताब क्रांतिकारी दुर्गा भाभी में लिखते हैं, “पृथ्वी सिंह आज़ाद ने आदेश दिया, ‘शूट’। दुर्गा भाभी ने तुरंत गोलियाँ चलाईं। सुखदेव ने भी गोलियाँ चलाईं। गोलीबारी में सार्जेंट टेलर और उनकी पत्नी मारे गए। दुर्गा भाभी के ड्राइवर जनार्दन बापट ने कार को फ़ौरन भगा लिया। घटना के फ़ौरन बाद दुर्गा देवी और सुखदेव राज कानपुर के लिए रवाना हो गए।” अब तक दुर्गा भाभी अंग्रेजों के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी थीं। उन्हें पकड़ने के लिए अंग्रेज हर संभव प्रयास कर रहे थे। दुर्गा भाभी अंग्रेजों के हाथ मुंबई के एक फ्लैट में अपने साथी क्रांतिकारी यशपाल के साथ लग गईं। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दुर्गा भाभी के खिलाफ कोई ठोस सबूत न मिलने के कारण अंग्रेज सरकार उन्हें अधिक समय तक कैद में नहीं रख सकी।

उधर साथी क्रांतिकारियों के बलिदानों का सिलसिला लगातार चल रहा था, जिससे दुर्गा भाभी बहुत अकेली पड़ गईं। भारत माता को गुलामी की बेड़ियों से स्वतंत्र कराने के अलावा वो स्वयं भी एक मां थीं। दुर्गा भाभी ने सोचा की वो अपने बेटे शचीन्द्र की शिक्षा की व्यवस्था ठीक से कर सकें, इस पर भी ध्यान देने की जरुरत है। यह विचार कर वो अपने बेटे के साथ दिल्ली आ गईं। लेकिन अंग्रेजों ने यहाँ भी उनको परेशान करना नहीं छोड़ा। उन्होंने लाहौर जाने का निर्णय लिया। जहाँ पुलिस ने उन्हें 3 सालों तक नजरबंद रखा।

यह सब होते-होते 1935 का चुका था। नजरबंदी हटने के साथ ही दुर्गा भाभी को लाहौर से जिलाबदर भी कर दिया गया। वो उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद आ गईं। यहाँ उन्होंने प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका के रूप में कार्य करना प्रारंभ कर दिया। वो अब निराशाजनक हालातों के कारण बहुत टूट चुकी थीं, लेकिन स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की जो आग उनके पति ने जलाई थी, वो अभी भी उनके दिल में जल रही थी। इसलिए वो दिल्ली आकर कांग्रेस से जुड़ गईं। किन्तु उस समय की कांग्रेस तो क्रांतिकारियों के कार्यों को हिंसा और अपराध मानती थी। संभवतः इसी कारण दुर्गा भाभी का मन कांग्रेस में नहीं लगा और उन्होंने 1937 में ही कांग्रेस छोड़ दी।

उस समय अंग्रेजी शिक्षा पद्धति ने अपना प्रभाव भारत में बना लिया था। दुर्गा भाभी को लगा की शायद इसके माध्यम से ही वो पढ़े-लिखे देशभक्त समाज का निर्माण कर सकें। इसलिए वो 1939 में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का ज्ञान लेने के लिए मद्रास चली गईं। शिक्षण का कार्य उन्होंने पहले भी गाजियाबाद में किया ही था, इसलिए अधिक समस्या नहीं हुई। दुर्गा भाभी ने 1940 में लखनऊ के कैंट रोड पर एक मकान में 5 बच्चों के साथ मांटेसरी विद्यालय खोला, जो आज मांटेसरी इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है। दुर्गा भाभी का अंतिम समय गाजियाबाद में गुजरा। उन्होंने 15 अक्टूबर 1999 को यहीं अंतिम सांस ली।

सन्दर्भ

फोटो साभार : दैनिक जागरण

लेखक मातृभूमि समाचार के सम्पादक हैं.

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