पोर्ट ब्लेयर (अंडमान), 30 दिसंबर 1943
आज का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। ‘आजाद हिंद फौज’ के सर्वोच्च कमांडर नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज पोर्ट ब्लेयर के ‘जिमखाना मैदान’ (अब नेताजी स्टेडियम) में आधिकारिक रूप से भारतीय स्वतंत्रता का झंडा फहराया। इस ऐतिहासिक घटना ने यह उद्घोष कर दिया है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अंत की शुरुआत हो चुकी है और भारत की पहली ‘आजाद’ भूमि अब विदेशी बेड़ियों से मुक्त है।
भारत की पहली मुक्त भूमि
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना द्वारा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को अंग्रेजों से जीतने के बाद, इसे औपचारिक रूप से नेताजी की ‘आजाद हिंद सरकार’ (Arzi Hukumat-e-Azad Hind) को सौंप दिया गया है। नेताजी ने इन द्वीपों को भारत का पहला मुक्त क्षेत्र घोषित करते हुए इनका नया नामकरण भी किया है:
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अंडमान: ‘शहीद’ द्वीप
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निकोबार: ‘स्वराज’ द्वीप
भावुक संबोधन और ‘चलो दिल्ली’ का संकल्प
झंडा फहराने के बाद उपस्थित जनसमूह और आजाद हिंद फौज के सैनिकों को संबोधित करते हुए नेताजी बेहद भावुक और जोश से भरे नजर आए। उन्होंने अपने संबोधन में कहा:
“यह तिरंगा इस बात का प्रतीक है कि भारतीय अब अपनी नियति खुद लिखने के लिए तैयार हैं। अंडमान की यह धरती, जो कभी ‘काला पानी’ के नाम से क्रांतिकारियों की सजा का प्रतीक थी, आज भारत की आजादी का पहला द्वार बन गई है।”
उन्होंने फिर से अपना प्रसिद्ध नारा “चलो दिल्ली” दोहराया और विश्वास जताया कि जल्द ही लाल किले पर भी इसी तरह तिरंगा लहराएगा।
शहीदों को श्रद्धांजलि
ध्वजारोहण के बाद नेताजी ने कुख्यात ‘सेल्यूलर जेल’ का भी दौरा किया। उन्होंने उन महान स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिन्होंने इन कोठरियों में ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार सहते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। उन्होंने जेल का निरीक्षण करते हुए इसे भारतीय देशभक्ति का एक पवित्र तीर्थ स्थल बताया।
वैश्विक राजनीति पर प्रभाव
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम से न केवल भारतीय क्रांतिकारियों का मनोबल बढ़ा है, बल्कि वैश्विक मंच पर भी ‘आजाद हिंद सरकार’ की साख मजबूत हुई है। नौ देशों (जापान, जर्मनी, इटली आदि) ने पहले ही इस सरकार को मान्यता दे दी है, और अब अपनी धरती होने से इसकी संप्रभुता और अधिक सशक्त हो गई है।
तैयार है, यहाँ आजाद हिंद फौज (INA) के गठन और इस ऐतिहासिक घटना के संदर्भ में विस्तृत जानकारी दी गई है:
आजाद हिंद फौज (INA): संकल्प से सिद्धि तक का सफर
आजाद हिंद फौज का गठन केवल एक सैन्य अभियान नहीं, बल्कि भारत की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए विदेशों में रहने वाले भारतीयों और युद्धबंदियों का एक महा-अभियान था।
गठन की पृष्ठभूमि (1942):
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शुरुआत: इसकी नींव सबसे पहले रासबिहारी बोस और कैप्टन मोहन सिंह ने 1942 में जापान में रखी थी। इसमें मुख्य रूप से वे भारतीय सैनिक शामिल थे जिन्हें जापान ने दक्षिण-पूर्व एशिया के युद्ध के दौरान बंदी बनाया था।
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नेताजी का आगमन: 1943 में जब सुभाष चंद्र बोस जर्मनी से एक लंबी और खतरनाक पनडुब्बी यात्रा के बाद सिंगापुर पहुँचे, तो रासबिहारी बोस ने फौज की कमान उन्हें सौंप दी। 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने ‘आजाद हिंद सरकार’ (Arzi Hukumat-e-Azad Hind) की स्थापना की घोषणा की।
“शहीद” और “स्वराज” द्वीपों का महत्व:
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रणनीतिक जीत: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान ने अंग्रेजों को हराकर अंडमान और निकोबार पर कब्जा कर लिया था। नेताजी के कूटनीतिक प्रयासों के कारण जापान ने इन द्वीपों का प्रशासन ‘आजाद हिंद सरकार’ को सौंपने का फैसला किया।
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नामकरण का अर्थ: नेताजी ने अंडमान को ‘शहीद’ नाम दिया ताकि उन बलिदानियों को याद किया जा सके जिन्होंने ‘काला पानी’ की सजा काटी थी। निकोबार को ‘स्वराज’ नाम दिया गया क्योंकि यह स्वशासन का प्रतीक बना।
‘झांसी की रानी’ रेजिमेंट:
नेताजी ने आधुनिक सोच के साथ दुनिया की पहली महिला रेजिमेंट में से एक, ‘झांसी की रानी रेजिमेंट’ बनाई, जिसकी कमान कैप्टन लक्ष्मी सहगल के हाथ में थी। यह इस बात का सबूत था कि भारत की आजादी की लड़ाई में महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हैं।
“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”:
सिंगापुर और बर्मा (म्यांमार) में भारतीयों को संबोधित करते हुए नेताजी ने यह प्रसिद्ध नारा दिया था। इस नारे ने दक्षिण-पूर्व एशिया में रह रहे लाखों भारतीयों (मजदूरों, व्यापारियों और छात्रों) को प्रेरित किया और उन्होंने अपनी संपत्ति और जीवन देश के लिए दान कर दिया।
भारत की सीमा पर दस्तक (1944):
पोर्ट ब्लेयर में झंडा फहराने के बाद, आजाद हिंद फौज ने ‘इंफाल’ और ‘कोहिमा’ के रास्ते भारत की मुख्य भूमि में प्रवेश करने का प्रयास किया। मार्च 1944 में पहली बार भारतीय भूमि (मोइरांग, मणिपुर) पर तिरंगा फहराया गया। हालांकि, खराब मौसम और रसद (Supplies) की कमी के कारण फौज को पीछे हटना पड़ा, लेकिन इस संघर्ष ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।
यह रहा आजाद हिंद फौज के नायकों और ऐतिहासिक ‘लाल किला मुकदमे’ का विस्तृत विवरण, जिसने भारत की आजादी की राह और भी आसान कर दी थी:
लाल किला मुकदमा (Red Fort Trials) – 1945-46
जब द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ और जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया, तो ब्रिटिश सरकार ने आजाद हिंद फौज के हजारों सैनिकों को बंदी बना लिया। उनमें से तीन प्रमुख अधिकारियों पर ‘राजद्रोह’ का मुकदमा चलाने के लिए दिल्ली के लाल किले को चुना गया।
- वे तीन नायक कौन थे?
विशेष बात यह थी कि ये तीनों अलग-अलग धर्मों से थे, जिसने पूरे भारत को एकता के सूत्र में पिरो दिया:
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कर्नल प्रेम सहगल (हिंदू)
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कर्नल गुरुबख्श सिंह ढिल्लों (सिख)
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Major जनरल शाह नवाज खान (मुस्लिम)
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- देशव्यापी जन-आक्रोश:
ब्रिटिश सरकार इन्हें ‘गद्दार’ साबित करना चाहती थी, लेकिन भारतीयों की नजर में वे ‘राष्ट्रीय नायक’ थे। पूरे देश में नारे गूंजने लगे— “लाल किले से आई आवाज, सहगल-ढिल्लों-शाहनवाज!”
- बचाव पक्ष के वकील:
इन महान सेनानियों को बचाने के लिए भारत के सबसे दिग्गज वकील मैदान में उतरे, जिनमें सर तेज बहादुर सप्रू, भूलाभाई देसाई और वर्षों बाद वकालत का कोट पहनने वाले जवाहरलाल नेहरू शामिल थे।
आजाद हिंद फौज के अन्य प्रमुख सेनानी
नेताजी के साथ इस सेना में कई ऐसे नाम थे जिनका योगदान अतुलनीय है:
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कैप्टन लक्ष्मी सहगल: वे पेशे से डॉक्टर थीं, लेकिन नेताजी के आह्वान पर ‘झांसी की रानी रेजिमेंट’ की कमांडर बनीं। वे भारत की पहली महिला सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करने वाली साहसी महिला थीं।
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रासबिहारी बोस: क्रांतिकारी जिन्होंने जापान में रहकर आजाद हिंद फौज की आधारशिला रखी और बाद में इसकी कमान सुभाष चंद्र बोस को सौंपी।
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मेजर जनरल ए.सी. चटर्जी: वे आजाद हिंद सरकार में वित्त मंत्री थे और प्रशासन संभालने में नेताजी के दाहिने हाथ माने जाते थे।
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कर्नल शौकत अली मलिक: इन्होंने ही 14 अप्रैल 1944 को मणिपुर के मोइरांग में पहली बार भारत की मुख्य भूमि पर आजाद हिंद फौज का झंडा फहराया था।
इस संघर्ष का परिणाम: ब्रिटिश राज का अंत
लाल किला मुकदमे ने वह कर दिखाया जो सालों के आंदोलनों से नहीं हुआ था:
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शाही भारतीय नौसेना विद्रोह (1946): आजाद हिंद फौज के समर्थन में बॉम्बे (मुंबई) में भारतीय नौसैनिकों ने विद्रोह कर दिया।
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सेना में असंतोष: अंग्रेजों को समझ आ गया कि अब भारतीय सैनिक उनके प्रति वफादार नहीं रहेंगे।
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तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने बाद में स्वीकार किया था कि नेताजी और INA के प्रभाव के कारण ही अंग्रेजों को भारत छोड़ने का फैसला जल्दबाजी में लेना पड़ा।
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