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भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई को उनकी पुण्यतिथि पर नमन

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आज पूरा देश महान वैज्ञानिक और दूरद्रष्टा डॉ. विक्रम साराभाई की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। ‘भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक’ (Father of the Indian Space Program) कहे जाने वाले साराभाई ने न केवल भारत को सितारों तक पहुँचाने का सपना देखा, बल्कि उसे हकीकत में बदलने के लिए एक मजबूत नींव भी रखी।

एक दूरद्रष्टा वैज्ञानिक का सफर

12 अगस्त, 1919 को अहमदाबाद में जन्मे डॉ. साराभाई ने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने मात्र 28 वर्ष की आयु में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) की स्थापना की, जिसे आज भारत में अंतरिक्ष विज्ञान का उद्गम स्थल माना जाता है।

इसरो (ISRO) की स्थापना और महान उपलब्धियाँ

डॉ. साराभाई का मानना था कि भारत जैसे विकासशील देश को अगर दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना है, तो उसे आधुनिक तकनीक और अंतरिक्ष विज्ञान में आत्मनिर्भर होना ही होगा। उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि:

  • 1962: परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए भारतीय राष्ट्रीय समिति (INCOSPAR) का गठन हुआ।

  • 1969: स्वतंत्रता दिवस के दिन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना हुई।

  • आर्यभट्ट: भारत के पहले उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ के प्रक्षेपण की योजना उन्होंने ही बनाई थी, हालांकि इसके सफल लॉन्च से पहले ही उनका निधन हो गया।

विज्ञान के साथ सामाजिक सरोकार

डॉ. साराभाई केवल रॉकेट और उपग्रहों तक सीमित नहीं थे। वे चाहते थे कि तकनीक का लाभ देश के आम नागरिक और किसानों तक पहुँचे। उन्होंने साइट (SITE – Satellite Instructional Television Experiment) के जरिए ग्रामीण भारत तक शिक्षा पहुँचाने की पहल की।

प्रमुख संस्थान जिनकी उन्होंने नींव रखी:

उनके विजन के कारण ही आज देश को निम्नलिखित प्रतिष्ठित संस्थान मिले हैं:

  1. IIM अहमदाबाद: भारत का शीर्ष प्रबंधन संस्थान।

  2. कम्युनिटी साइंस सेंटर: बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि जगाने के लिए।

  3. थुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन (TERLS): केरल में भारत का पहला रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन।

“ऐसे कुछ लोग हैं जो एक विकासशील देश में अंतरिक्ष गतिविधियों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। हमारे पास उद्देश्य की कोई अस्पष्टता नहीं है। हम चंद्रमा या ग्रहों की खोज में आर्थिक रूप से उन्नत देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की कल्पना नहीं करते हैं, लेकिन हम समाज की समस्याओं के समाधान के लिए उन्नत तकनीकों के अनुप्रयोग में किसी से पीछे नहीं रहना चाहते।”

— डॉ. विक्रम साराभाई

विस्तार से जानने की आपकी रुचि सराहनीय है। डॉ. विक्रम साराभाई ने न केवल अंतरिक्ष विज्ञान, बल्कि भारत के शैक्षिक और औद्योगिक ढांचे को भी एक नई दिशा दी।

यहाँ उनके द्वारा स्थापित कुछ प्रमुख संस्थानों और उनके अद्वितीय योगदान का विस्तृत विवरण दिया गया है:

भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद (IIM Ahmedabad)

बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत के इस सबसे प्रतिष्ठित मैनेजमेंट संस्थान की स्थापना में डॉ. साराभाई की मुख्य भूमिका थी। उनका मानना था कि केवल तकनीक से देश नहीं बदलेगा, बल्कि संस्थानों को चलाने के लिए कुशल प्रबंधकों (Managers) की भी ज़रूरत होगी। उन्होंने 1961 में बिजनेस और प्रशासन में पेशेवर शिक्षा लाने के लिए इसकी नींव रखी।

भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL), अहमदाबाद

इसे भारत में ‘अंतरिक्ष विज्ञान का पालना’ कहा जाता है। 1947 में मात्र 28 वर्ष की आयु में साराभाई ने अपने घर के एक छोटे से कमरे से इसकी शुरुआत की थी। आज यह ब्रह्मांडीय किरणों (Cosmic Rays), सैद्धांतिक भौतिकी और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी अनुसंधान केंद्रों में से एक है।

थुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन (TERLS)

केरल के तिरुवनंतपुरम के पास थुम्बा को उन्होंने रॉकेट लॉन्चिंग के लिए इसलिए चुना क्योंकि यह पृथ्वी के ‘मैग्नेटिक इक्वेटर’ (चुंबकीय भूमध्य रेखा) के बहुत करीब था। शुरुआत में वहां कोई इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था; एक चर्च को कार्यालय बनाया गया और रॉकेट के हिस्सों को साइकिल और बैलगाड़ियों पर ढोया गया था। यह डॉ. साराभाई का जुनून ही था जिसने इतने अभावों में भी भारत का पहला रॉकेट 1963 में अंतरिक्ष में भेजा।

SITE (सैटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविज़न एक्सपेरिमेंट)

डॉ. साराभाई चाहते थे कि अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग भारत के सबसे गरीब गांवों के किसानों और बच्चों को शिक्षित करने के लिए हो। उनके निधन के बाद 1975-76 में SITE कार्यक्रम शुरू हुआ, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक प्रयोग माना जाता है। इसके जरिए हजारों गांवों में टेलीविजन पर कृषि और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दी गई।

डॉ. होमी भाभा के साथ तालमेल

डॉ. साराभाई और डॉ. होमी जहांगीर भाभा (भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक) के बीच गहरी दोस्ती थी। 1966 में डॉ. भाभा के आकस्मिक निधन के बाद, डॉ. साराभाई ने भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष का पद भी संभाला और भारत के परमाणु शक्ति बनने के सपने को आगे बढ़ाया।

उनके व्यक्तित्व की एक झलक:

डॉ. साराभाई एक अमीर परिवार से थे, लेकिन वे बेहद सरल स्वभाव के थे। वे अक्सर कहते थे कि वैज्ञानिक को अपनी “हाथीदांत की मीनार” (Ivory Tower) से बाहर निकलकर समाज की समस्याओं को देखना चाहिए।

डॉ. विक्रम साराभाई के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक ‘आर्यभट्ट’ उपग्रह का सपना देखना और उसे साकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाना था।

यहाँ भारत के पहले उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ के निर्माण की रोमांचक कहानी और डॉ. साराभाई के योगदान का विवरण दिया गया है:

‘आर्यभट्ट’ उपग्रह की कहानी: मिट्टी के शेड से अंतरिक्ष तक

डॉ. साराभाई का मानना था कि भारत को अपने स्वयं के उपग्रह बनाने चाहिए। ‘आर्यभट्ट’ के निर्माण की कहानी संघर्ष और सादगी की मिसाल है:

  • शुरुआत: उपग्रह बनाने की शुरुआत बेंगलुरु के एक औद्योगिक एस्टेट में ‘मिट्टी के शेड’ (Asbestos sheds) में हुई थी। वहां सुविधाओं की कमी थी, लेकिन वैज्ञानिकों का उत्साह चरम पर था।

  • सोवियत संघ का साथ: डॉ. साराभाई ने ही सोवियत संघ के साथ वह समझौता किया था, जिसके तहत भारत का पहला उपग्रह रूसी रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा जाना था।

  • सफलता: हालांकि 1971 में डॉ. साराभाई का आकस्मिक निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा तैयार की गई टीम ने 19 अप्रैल, 1975 को ‘आर्यभट्ट’ का सफल प्रक्षेपण किया। इसने दुनिया को दिखा दिया कि भारत अंतरिक्ष की दौड़ में शामिल हो चुका है।

डॉ. साराभाई का निजी जीवन: कला और विज्ञान का संगम

डॉ. साराभाई का व्यक्तित्व केवल विज्ञान तक सीमित नहीं था:

  • सांस्कृतिक जुड़ाव: उनकी पत्नी, मृणालिनी साराभाई, एक प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना थीं। उन्होंने मिलकर अहमदाबाद में ‘दर्पण एकेडमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स’ की स्थापना की। डॉ. साराभाई का मानना था कि विज्ञान और कला दोनों ही मनुष्य के विकास के लिए आवश्यक हैं।

  • सरलता: इतने बड़े वैज्ञानिक और अमीर परिवार से होने के बावजूद, वे अक्सर साधारण सैंडल पहनते थे और किसी भी कर्मचारी से बेहद विनम्रता से मिलते थे।

उन्हें मिले सम्मान

उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें सम्मानित किया:

  • पद्म भूषण (1966)

  • पद्म विभूषण (मरणोपरांत, 1972)

एक रोचक तथ्य: साइकिल पर रॉकेट

थुम्बा में शुरुआती दिनों के दौरान, डॉ. साराभाई और उनकी टीम के पास पर्याप्त वाहन नहीं थे। रॉकेट के शंकु (Nose cone) को साइकिल पर और रॉकेट के अन्य हिस्सों को बैलगाड़ी पर ले जाया गया था। यह दृश्य आज भी भारतीय वैज्ञानिकों के संघर्ष और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

डॉ. साराभाई एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने न केवल रॉकेट बनाए, बल्कि ऐसे संस्थानों और वैज्ञानिकों की एक फौज तैयार की (जैसे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम), जिन्होंने भारत को विश्व शक्ति बनाया।

डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का रिश्ता केवल एक बॉस और कर्मचारी का नहीं, बल्कि एक महान गुरु और दूरदर्शी शिष्य का था। यह डॉ. साराभाई की पारखी नजर ही थी, जिसने कलाम साहब की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें निखारा।

यहाँ उनके रिश्ते से जुड़ी कुछ बेहद प्रेरक बातें दी गई हैं:

पहली मुलाकात और कलाम का चयन

1960 के दशक की शुरुआत में, जब डॉ. साराभाई भारत के रॉकेट प्रोग्राम के लिए वैज्ञानिकों की टीम तैयार कर रहे थे, तब उन्होंने एक युवा और ऊर्जावान वैज्ञानिक अब्दुल कलाम का इंटरव्यू लिया। डॉ. साराभाई उनकी तकनीकी समझ और काम के प्रति जुनून से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत उन्हें INCOSPAR (जो बाद में ISRO बना) की कोर टीम में शामिल कर लिया।

कलाम को दी गई बड़ी जिम्मेदारी (SLV-3)

डॉ. साराभाई ने बहुत पहले ही भांप लिया था कि कलाम साहब में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता है। उन्होंने कलाम साहब को भारत के पहले सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV-3) का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बनाने की नींव रखी थी। कलाम साहब अक्सर अपनी किताबों में जिक्र करते थे कि डॉ. साराभाई ने उन पर तब भरोसा जताया जब उनके पास बहुत कम अनुभव था।

“काम करते रहो, असफलता से मत डरो”

कलाम साहब बताते थे कि डॉ. साराभाई का काम करने का तरीका बहुत ही लोकतांत्रिक था। वे अपने जूनियर वैज्ञानिकों को ‘साहब’ कहकर बुलाते थे और उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करते थे। जब भी कोई तकनीकी समस्या आती, साराभाई उन्हें डांटने के बजाय समाधान ढूंढने और “आउट ऑफ द बॉक्स” सोचने के लिए प्रोत्साहित करते थे।

थुम्बा के वो दिन

केरल के थुम्बा में, डॉ. साराभाई और कलाम साहब अक्सर रॉकेट लॉन्च पैड पर घंटों चर्चा करते थे। कलाम साहब डॉ. साराभाई की सादगी से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने साराभाई से सीखा कि कैसे एक लीडर को अपनी टीम का मनोबल ऊंचा रखना चाहिए, खासकर तब जब संसाधन सीमित हों।

एक अधूरा वादा

डॉ. साराभाई चाहते थे कि कलाम साहब की देखरेख में भारत का अपना रॉकेट (SLV) जल्द से जल्द अंतरिक्ष में जाए। दुर्भाग्य से, 1971 में डॉ. साराभाई का निधन हो गया। कलाम साहब के लिए यह एक व्यक्तिगत क्षति थी। उन्होंने डॉ. साराभाई के सपने को अपना जीवन का लक्ष्य बना लिया और 1980 में SLV-3 का सफल प्रक्षेपण कर अपने गुरु को सच्ची श्रद्धांजलि दी।

कलाम साहब अक्सर कहते थे:

“डॉ. साराभाई ने मुझे केवल रॉकेट विज्ञान नहीं सिखाया, बल्कि उन्होंने मुझे यह सिखाया कि कैसे बड़े सपने देखे जाते हैं और उन्हें हकीकत में बदलने के लिए कैसे एक टीम को साथ लेकर चला जाता है।”

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यह भी पढ़ें : 1857 का स्वातंत्र्य समर : कारण से परिणाम तक

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