ढाका. बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के गिरने के बाद से जारी राजनीतिक अस्थिरता के बीच धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमलों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाल ही में हुई ‘मॉब लिंचिंग’ और हिंसा की घटनाओं के बाद अब देश के अल्पसंख्यक समुदायों ने अंतरिम सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अल्पसंख्यक संगठनों ने अपनी मांगों को लेकर संसदीय सत्र और विधाई शक्ति की मांग की है।
प्रमुख मांगें: संसद में प्रतिनिधित्व और सुरक्षा
बांग्लादेश के विभिन्न हिंदू और अल्पसंख्यक संगठनों ने अंतरिम मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की सरकार के सामने एक आठ सूत्री एजेंडा पेश किया है। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
संसद में आरक्षित सीटें: अल्पसंख्यक समुदायों ने बांग्लादेश की राष्ट्रीय संसद में अपने लिए 60 सीटें आरक्षित करने की मांग की है। उनका तर्क है कि बिना विधाई शक्ति के उनके अधिकारों की रक्षा संभव नहीं है।
नामांकन कोटा: 2026 में प्रस्तावित संसदीय चुनावों के लिए राजनीतिक दलों से अल्पसंख्यकों को 10% नामांकन कोटा देने की अपील की गई है।
सुरक्षा की गारंटी: चुनाव के दौरान और बाद में अल्पसंख्यकों के लिए ‘भयमुक्त वातावरण’ और पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विशेष कानून की मांग की गई है।
धर्मनिरपेक्ष शासन: अल्पसंख्यकों ने मांग की है कि धर्म के दुरुपयोग पर रोक लगाई जाए और सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए जाएं।
अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारत की प्रतिक्रिया
भारत सरकार ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही ‘निरंतर शत्रुता’ पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के अनुसार, अगस्त 2024 से अब तक अल्पसंख्यकों के खिलाफ 2,900 से अधिक हिंसक घटनाएं दर्ज की गई हैं। हाल ही में मैमनसिंह और राजबारी में हिंदू युवाओं (दीपू चंद्र दास और अमृत मंडल) की हत्या ने तनाव को और बढ़ा दिया है।
सत्तारूढ़ सरकार का रुख
हालांकि, मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ये ‘छिटपुट आपराधिक घटनाएं’ हैं, जिन्हें भारत में जानबूझकर ‘प्रणालीगत उत्पीड़न’ के रूप में पेश किया जा रहा है। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी वर्तमान सरकार पर अल्पसंख्यकों को बचाने में विफल रहने और चरमपंथियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।
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