तेहरान. पश्चिम एशिया (West Asia) में जारी भीषण तनाव के बीच ईरान और पाकिस्तान के संबंधों में एक नया मोड़ आ गया है। ईरान ने पाकिस्तान को अत्यंत सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि वह अपनी जमीन या हवाई क्षेत्र का उपयोग अमेरिका को ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए करने देता है, तो इसे सीधे तौर पर एक ‘शत्रुतापूर्ण कदम’ (Hostile Act) माना जाएगा।
तेहरान द्वारा जारी इस बयान ने दक्षिण एशिया और खाड़ी देशों के बीच कूटनीतिक हलचल तेज कर दी है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह चेतावनी केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य के किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष की आहट हो सकती है।
ईरान की संप्रभुता और क्षेत्रीय सुरक्षा पर कड़ा रुख
ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पड़ोसी देश द्वारा अपनी जमीन का इस्तेमाल ‘तीसरी शक्ति’ (अमेरिका) को हमले के लिए करने देना क्षेत्रीय शांति के साथ खिलवाड़ होगा। बयान में जोर देकर कहा गया है:
“ईरान अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। यदि हमारी सीमाओं के खिलाफ किसी भी पड़ोसी देश की जमीन का इस्तेमाल होता है, तो ईरान आत्मरक्षा में आवश्यक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।”
अमेरिका-ईरान तनाव और पाकिस्तान की भूमिका
पिछले कुछ हफ्तों में अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा ईरान के महत्वपूर्ण सैन्य और परमाणु ठिकानों पर संभावित हमलों की अटकलें तेज हुई हैं। ऐसे में पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति (Geographical Location) रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
अतीत में, अफगानिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र और सैन्य ठिकानों तक पहुंच प्रदान की थी, लेकिन ईरान के मामले में स्थिति पूरी तरह भिन्न है। ईरान और पाकिस्तान के बीच पहले से ही सीमा सुरक्षा और उग्रवाद को लेकर तनाव बना हुआ है।
पाकिस्तान के सामने ‘धर्मसंकट’ की स्थिति
पाकिस्तान सरकार के लिए यह स्थिति किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान के सामने दो बड़ी बाधाएं हैं:
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आर्थिक दबाव: पाकिस्तान वर्तमान में गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) व अमेरिकी समर्थन की आवश्यकता है।
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सुरक्षा और पड़ोस: ईरान के साथ सीधी दुश्मनी मोल लेने का अर्थ है अपनी पश्चिमी सीमा पर एक नया मोर्चा खोलना, जो पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
फिलहाल, इस्लामाबाद की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान इस मामले में ‘न्यूट्रल’ (तटस्थ) रहने की कोशिश करेगा।
बदल सकता है भू-राजनीतिक समीकरण
वरिष्ठ राजनयिकों का कहना है कि यदि पाकिस्तान दबाव में आकर किसी भी प्रकार की सैन्य सुविधा अमेरिका को प्रदान करता है, तो इसका असर केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा।
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चीन-ईरान-पाकिस्तान त्रिकोण: चीन इस क्षेत्र में स्थिरता चाहता है क्योंकि उसके बड़े निवेश (CPEC) यहीं केंद्रित हैं। ईरान-पाकिस्तान संघर्ष चीन के हितों को भी प्रभावित करेगा।
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मध्य पूर्व पर प्रभाव: इस तनाव से समूचे खाड़ी क्षेत्र में असुरक्षा का माहौल पैदा होगा, जिससे कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक व्यापार पर सीधा असर पड़ेगा।
ईरान की यह चेतावनी पाकिस्तान के लिए एक बड़ी परीक्षा है। क्या पाकिस्तान अपने पुराने सहयोगी अमेरिका का साथ देगा या अपने पड़ोसी ईरान के साथ संबंधों को प्राथमिकता देगा? आने वाले कुछ दिन पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की भविष्य की राजनीति के लिए निर्णायक साबित होंगे।
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