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ईरान पर हमले के लिए अमेरिका को नहीं मिलेगा यूरोपीय देशों का साथ; स्पेन ने हवाई क्षेत्र देने से किया इनकार

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ईरान-अमेरिका युद्ध की स्थिति में अमेरिकी लड़ाकू विमानों का रूट मैप।

वाशिंगटन. पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ते सैन्य तनाव ने अब वैश्विक कूटनीति और सैन्य गठबंधनों के बीच एक बड़ी लकीर खींच दी है। ईरान के खिलाफ संभावित अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को लेकर यूरोप के प्रमुख देशों ने कड़ा रुख अपनाते हुए वाशिंगटन को बड़ा झटका दिया है। स्पेन और कई अन्य यूरोपीय सहयोगियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे ईरान पर किसी भी हमले के लिए अपने हवाई क्षेत्र (Airspace) के इस्तेमाल की अनुमति नहीं देंगे।

✈️ सैन्य सहयोग से पीछे हटे यूरोपीय देश: क्या है पूरा मामला?

रक्षा सूत्रों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पेंटागन ने हाल ही में अपने यूरोपीय सहयोगियों से संपर्क कर ईरान के खिलाफ रणनीतिक ऑपरेशन की स्थिति में अपने घातक लड़ाकू विमानों और लंबी दूरी के बमवर्षकों (Bombers) के लिए हवाई मार्ग की मांग की थी।

हालांकि, स्पेन की सरकार ने आधिकारिक बयान जारी कर इस अनुरोध को सिरे से खारिज कर दिया। स्पेन का तर्क है कि इस प्रकार की सैन्य कार्रवाई न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हो सकती है, बल्कि इससे पूरे क्षेत्र में एक ऐसी ‘क्षेत्रीय आग’ (Regional Conflict) भड़क सकती है जिसे बुझाना नामुमकिन होगा।

प्रमुख देशों का रुख:

  1. स्पेन: आधिकारिक तौर पर एयरस्पेस और सैन्य अड्डों के उपयोग पर पाबंदी लगाई।

  2. जर्मनी और फ्रांस: इन देशों ने ‘तटस्थता’ की नीति अपनाते हुए सीधे तौर पर सैन्य अभियान का हिस्सा बनने से दूरी बनाई है।

  3. नॉर्डिक देश: कुछ उत्तरी यूरोपीय देशों ने भी कूटनीतिक समाधान पर जोर देते हुए सैन्य उड़ानों के लिए अनुमति देने में हिचकिचाहट दिखाई है।

🌍 युद्ध की रणनीति और लॉजिस्टिक्स पर पड़ेगा गहरा असर

विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय देशों के इस असहयोग से अमेरिका की सैन्य योजनाओं पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा:

  • वैकल्पिक और लंबा मार्ग: स्पेन और फ्रांस जैसे देशों के हवाई क्षेत्र बंद होने से अमेरिकी विमानों को अटलांटिक महासागर से घूमकर एक लंबा और खर्चीला रास्ता अपनाना होगा। इससे ऑपरेशन की लागत और समय दोनों बढ़ जाएंगे।

  • ईंधन और रसद (Logistics): लंबी उड़ानों के लिए हवा में ईंधन भरने (Mid-air refueling) की आवश्यकता बढ़ेगी, जिससे मिशन की जटिलता कई गुना बढ़ सकती है।

  • NATO में वैचारिक मतभेद: यह घटनाक्रम NATO (उत्तर अटलांटिक संधि संगठन) के भीतर बढ़ते रणनीतिक मतभेदों को भी उजागर करता है। जहाँ अमेरिका ‘आक्रामक रक्षा’ की नीति अपना रहा है, वहीं यूरोप आर्थिक और मानवीय संकट के डर से कूटनीति को प्राथमिकता दे रहा है।

📈 विशेषज्ञों की राय: कूटनीति बनाम सैन्य शक्ति

भू-राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पश्चिम एशिया में तनाव को कूटनीतिक तरीके से सुलझाया जाना ही एकमात्र विकल्प है। यदि अमेरिका बिना यूरोपीय सहयोग के एकतरफा कार्रवाई करता है, तो इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति (Oil Supply), शेयर बाजारों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा समझौतों पर पड़ सकता है।

यूरोपीय देशों का तर्क है कि ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच चल रहा यह त्रिकोणीय संघर्ष यदि व्यापक युद्ध में बदला, तो शरणार्थी संकट (Refugee Crisis) का सबसे बड़ा बोझ यूरोप को ही उठाना पड़ेगा।

वर्तमान स्थिति यह संकेत दे रही है कि अमेरिका अब अपने पुराने सहयोगियों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं कर सकता। स्पेन का यह ‘कड़ा रुख’ अन्य देशों के लिए भी एक नजीर पेश कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अमेरिका कूटनीतिक दबाव के जरिए इन देशों को मनाने में सफल होता है या फिर उसे अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव करना पड़ता है।

विश्व समाचार: matribhumisamachar.com/world-news

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