नई दिल्ली । मंगलवार, 2 जून 2026
इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप निर्माण के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में नीति आयोग ने आज एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। नीति आयोग के फ्रंटियर टेक हब (Frontier Tech Hub) ने देश का पहला 10 साल का व्यापक विजन दस्तावेज़ “फ्यूचर ऑफ इंडियाज सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री” (भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग का भविष्य) जारी कर दिया है।
इस आसान, दूरदर्शी और साफ रणनीति का मुख्य मकसद चिप्स के लिए भारत की विदेशी निर्भरता को पूरी तरह से समाप्त करना है। इस योजना के तहत साल 2035 तक भारत को दुनिया का एक ऐसा मुख्य सेमीकंडक्टर केंद्र (Global Chip Hub) बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके बिना दुनिया की वैश्विक चिप सप्लाई चेन अधूरी मानी जाएगी। यह नया रोडमैप हाल ही में बजट 2026 में घोषित किए गए ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0’ (ISM 2.0) को जमीन पर उतारने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा।
क्यों है सेमीकंडक्टर ‘चिप’ भारत के लिए इतनी जरूरी?
आज के डिजिटल और एआई (AI) युग में सेमीकंडक्टर यानी ‘चिप’ सिर्फ एक छोटा सा पुर्जा नहीं रह गई है। यह किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक मजबूती और डिजिटल संप्रभुता (नॉन-डिपेंडेंसी) की धुरी बन चुकी है।
हमारे जीवन और देश की सुरक्षा से जुड़ी निम्नलिखित महत्वपूर्ण चीजें सेमीकंडक्टर चिप के बिना अधूरी हैं:
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रक्षा और सेना: आधुनिक मिसाइल सिस्टम, लड़ाकू विमान, रडार और ड्रोन।
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कम्युनिकेशन और कंप्यूटिंग: स्मार्टफोन, हाई-स्पीड 5G/6G नेटवर्क और एडवांस एआई (AI) सुपरकंप्यूटर्स।
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ऑटोमोटिव और हेल्थकेयर: आज की स्मार्ट और इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ (EVs) तथा अस्पतालों की आधुनिक लाइफ-सपोर्टिंग मशीनें।
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डिजिटल अर्थव्यवस्था: देश का सुरक्षित और मजबूत डिजिटल पेमेंट सिस्टम (UPI)।
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों और भू-राजनीतिक (Geopolitical) बदलावों को देखते हुए, भारत के पास खुद को एक सुरक्षित और भरोसेमंद देश के रूप में स्थापित करने का यह सबसे सही मौका है। यही कारण है कि सरकार और उद्योग जगत के शीर्ष विशेषज्ञों ने मिलकर इस मास्टरप्लान को तैयार किया है, ताकि साल 2035 तक देश के भीतर ही 120 से 150 अरब डॉलर (USD 120-150 Billion) का विशाल घरेलू सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम खड़ा किया जा सके।
आयात (Import) का भारी बोझ और सुरक्षा का बड़ा खतरा
वर्तमान में भारत अपनी जरूरत की लगभग 90 से 95 प्रतिशत सेमीकंडक्टर चिप्स दूसरे देशों से आयात करता है। इस भारी निर्भरता की वजह से देश का बहुत बड़ा राजस्व बाहर चला जाता है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2017 से 2025 के बीच भारत ने विदेशी चिप्स मंगाने में लगभग 150 अरब डॉलर की भारी-भरकम विदेशी मुद्रा खर्च की है।
इसके अलावा, दुनिया की ज्यादातर चिप्स सिर्फ ताइवान और चीन जैसे गिने-चुने देशों में बनती हैं। कोरोना महामारी (Covid-19) के समय जब उन देशों में काम रुका, तो पूरी दुनिया में चिप की भारी किल्लत हो गई थी, जिससे भारतीय ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को बड़ा झटका लगा था। रक्षा के नजरिए से देखें तो मिसाइल और लड़ाकू विमानों में विदेशी चिप लगाना सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा जोखिम है क्योंकि इनमें ‘बैकडोर मालवेयर’ या जासूसी का खतरा हमेशा बना रहता है। इसीलिए भारत में ही चिप बनाना अब एक विकल्प नहीं बल्कि सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।
कामयाबी के 5 मुख्य स्तंभ (5 Pillars of Success)
नीति आयोग ने इस 10 साल के विजन को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए 5 मुख्य रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित किया है:
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रिसर्च और नए डिजाइन (R&D and Chip Design): भारत के बेहतरीन कोडिंग और इंजीनियरिंग टैलेंट का इस्तेमाल करके देश में ही 100 से ज्यादा नए और एडवांस सेमीकंडक्टर डिजाइन (IPs) तैयार करना।
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पूंजी और सुगम नीतियां (Capital and Policy Support): चिप निर्माण में अरबों डॉलर के निवेश की जरूरत होती है। इसलिए वैश्विक निवेशकों को आकर्षित करने के लिए आसान नीतियां, सब्सिडी और लंबे समय का वित्तीय फंड (Long-term funding) जुटाना।
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एडवांस पैकेजिंग और निर्माण (OSAT & Compound Semiconductors): केवल सिलिकॉन वेफर बनाने तक सीमित न रहकर, चिप की सुरक्षित एडवांस पैकेजिंग (OSAT – Outsourced Semiconductor Assembly and Test) और नई तकनीक वाले ‘कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स’ के उत्पादन में भारत को दुनिया का लीडर बनाना।
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टैलेंटेड युवाओं की फौज (Skilled Workforce): कॉलेज स्तर के पाठ्यक्रमों (जैसे AICTE के चिप डिजाइन कोर्स) से लेकर फैक्ट्रियों तक, युवाओं को इस तरह की ट्रेनिंग देना ताकि देश को लाखों कुशल इंजीनियर और टेक्नीशियन मिल सकें।
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भरोसेमंद वैश्विक दोस्ती (Resilient Global Alliances): दुनिया के मित्र देशों (जैसे क्वाड देश, अमेरिका, जापान) और बड़ी वैश्विक कंपनियों के साथ मिलकर एक सुरक्षित और अटूट सप्लाई चेन का निर्माण करना।
भारतीय बाजार में अभूतपूर्व तेजी और विकास दर
पूरी दुनिया के मुकाबले भारतीय बाजार में चिप की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। जहाँ वैश्विक स्तर पर इसकी मांग 8.5% की रफ्तार से बढ़ रही है, वहीं भारत में यह 19% की सालाना दर (CAGR) से आगे भाग रही है।
बाजार का अनुमानित आकार (Growth Chart):
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साल 2030 तक: 90 अरब डॉलर (USD 90 Billion)
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साल 2035 तक: 200 अरब डॉलर से अधिक (USD 200 Billion+)
नीति आयोग का यह रोडमैप न सिर्फ भारत को तकनीकी रूप से सशक्त बनाएगा, बल्कि देश के लाखों युवाओं को हाई-टेक रोजगार देगा और आम जनता के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों को सस्ता और सुरक्षित बनाएगा।
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