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मराठा साम्राज्य का रणनीतिक उत्थान: सूरत अभियान की विजय गाथा

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छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा सूरत पर किया गया आक्रमण मराठा इतिहास की एक युगांतकारी घटना थी। यह न केवल धन संचय का माध्यम था, बल्कि मुगल बादशाह औरंगजेब की प्रतिष्ठा और आर्थिक शक्ति पर एक सोची-समझी रणनीतिक चोट थी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उद्देश्य

1660 के दशक की शुरुआत में, मुगल सेनापति शाइस्ता खान ने पुणे पर कब्जा कर लिया था और मराठा क्षेत्रों को काफी नुकसान पहुँचाया था। शिवाजी महाराज को अपनी सेना के पुनर्गठन और स्वराज के विस्तार के लिए भारी धन की आवश्यकता थी।

सूरत उस समय मुगलों का सबसे समृद्ध व्यापारिक केंद्र और ‘मक्का का द्वार’ (बाबल मक्का) माना जाता था। यहाँ से मुगलों को भारी मात्रा में सीमा शुल्क (Customs) प्राप्त होता था।

“सूरत उस समय का सोने का दरवाजा था। शिवाजी ने महसूस किया कि इस दरवाजे पर चोट करना सीधे मुगल साम्राज्य की कमर तोड़ने जैसा होगा।” – इतिहासकार जदुनाथ सरकार

आक्रमण की रणनीति (जनवरी 1664)

शिवाजी महाराज ने अपनी योजना को बेहद गुप्त रखा। उन्होंने अफवाह फैलाई कि वे दक्षिण की ओर जा रहे हैं, लेकिन अचानक अपनी 8,000 की घुड़सवार सेना के साथ उत्तर की ओर मुड़ गए। 5 जनवरी, 1664 को मराठा सेना सूरत की सीमाओं पर पहुँच गई।

मुख्य घटनाक्रम:

प्रशासनिक विफलता: सूरत का मुगल गवर्नर, इनायत खान, डर के मारे किले में छिप गया और शहर को असुरक्षित छोड़ दिया।

आर्थिक चोट: मराठों ने केवल धनी व्यापारियों और मुगल खजाने को निशाना बनाया। आम नागरिकों और विदेशी कोठियों (जो तटस्थ रहे) को कम से कम नुकसान पहुँचाया गया।

ब्रिटिश और डच: अंग्रेजों ने अपनी फैक्ट्री की रक्षा की, जिसके कारण मराठों और अंग्रेजों के बीच छोटी झड़पें भी हुईं।

लूट का विवरण और प्रभाव

यह आक्रमण 6 जनवरी से 10 जनवरी तक चला। मराठा सेना अपने साथ स्वर्ण, रजत, मोती और हीरे-जवाहरात लेकर निकली, जिसकी कीमत उस समय करोड़ों में आँकी गई थी।

आर्थिक लाभ: इस धन का उपयोग रायगढ़ के किले के निर्माण और मराठा नौसेना को मजबूत करने में किया गया।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव: औरंगजेब के लिए यह एक बड़ा अपमान था। दुनिया को यह संदेश गया कि मुगल अपने सबसे अमीर शहर की रक्षा करने में भी अक्षम हैं।

“शिवाजी ने सूरत को नहीं लूटा, बल्कि औरंगजेब के अहंकार और उसकी सल्तनत की सुरक्षा के दावे को लूटा था।” – इतिहासकार जे.एन. सरकार (Shivaji and His Times)

निष्कर्ष: रणनीतिक दूरदर्शिता

सूरत पर आक्रमण केवल एक छापा नहीं था, बल्कि आर्थिक युद्ध (Economic Warfare) का एक उत्कृष्ट उदाहरण था। शिवाजी महाराज ने दिखाया कि एक छोटी लेकिन गतिशील सेना कैसे एक विशाल साम्राज्य की आर्थिक जड़ों को हिला सकती है। इसके बाद 1670 में शिवाजी ने दोबारा सूरत पर आक्रमण किया, जिससे मुगलों का इस व्यापारिक केंद्र पर नियंत्रण और भी कमजोर हो गया।

जैसा कि आपने रुचि दिखाई है, यहाँ 1670 के दूसरे सूरत आक्रमण और उसके परिणामस्वरूप हुई पुरंदर की संधि के टूटने का विस्तृत विवरण दिया गया है:

दूसरा सूरत आक्रमण (अक्टूबर 1670)

1664 के पहले हमले के छह साल बाद, शिवाजी महाराज ने दोबारा सूरत पर आक्रमण किया। इस बार परिस्थितियाँ अलग थीं; यह आक्रमण मुगल बादशाह औरंगजेब द्वारा संधि की शर्तों का उल्लंघन करने और मराठा क्षेत्रों पर दबाव बनाने का जवाब था।

मुख्य बिंदु:

रणनीतिक गति: शिवाजी महाराज मात्र 15,000 सैनिकों के साथ सूरत पहुँचे।

पूर्ण प्रभुत्व: इस बार मुगल प्रतिरोध और भी कमजोर था। मराठों ने तीन दिनों तक शहर पर नियंत्रण रखा और भारी मात्रा में राजस्व एकत्रित किया।

चौथ की माँग: इसी समय से शिवाजी महाराज ने मुगलों से ‘चौथ’ (राजस्व का 1/4 हिस्सा) वसूलने की परंपरा को मजबूती से स्थापित किया।

कोटेशन: “सूरत का दूसरा पतन मुगलों के लिए इस बात की पुष्टि थी कि शिवाजी केवल एक विद्रोही नहीं, बल्कि एक समांतर सत्ता बन चुके हैं जिसे रोका नहीं जा सकता।” — ग्रैंड डफ (A History of the Mahrattas)

पुरंदर की संधि का अंत और नया संघर्ष

1665 में हुई ‘पुरंदर की संधि’ के तहत शिवाजी महाराज को अपने 23 किले मुगलों को सौंपने पड़े थे। लेकिन 1670 का सूरत अभियान इस संधि के पूर्णतः अंत की घोषणा थी।

संधि टूटने के परिणाम:

किले की वापसी: सूरत से प्राप्त धन और संसाधनों का उपयोग करके शिवाजी महाराज ने मुगलों को दिए गए अपने किले (जैसे सिंहगढ़, पुरंदर, कल्याण) वापस जीतना शुरू कर दिया।

वंचि का युद्ध (Battle of Vani-Dindori): सूरत से लौटते समय मुगल सेना ने मराठों को रोकने की कोशिश की, लेकिन शिवाजी महाराज ने उन्हें करारी शिकस्त दी। यह उनकी खुली मैदानी जंग में बड़ी जीत थी।

वंचि-दिंडोरी का युद्ध: मुगलों पर रणनीतिक विजय

वंचि-दिंडोरी का युद्ध (Battle of Vani-Dindori) मराठा इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य उपलब्धि है। यह युद्ध अक्टूबर 1670 में सूरत के दूसरे अभियान से लौटते समय हुआ था।

पृष्ठभूमि: सूरत की वापसी और घेराबंदी

जब छत्रपति शिवाजी महाराज सूरत को दूसरी बार लूटकर भारी संपत्ति के साथ वापस लौट रहे थे, तब मुगल सेनापति दाउद खान और इखलास खान ने उनका रास्ता रोकने की योजना बनाई। नासिक के पास वंचि और दिंडोरी के बीच मराठों को एक विशाल मुगल सेना ने घेर लिया।

शिवाजी महाराज की युद्ध रणनीति (Guerilla Tactics)

मराठों के पास लूट का माल (सोना-चांदी) था, जिससे उनकी गति धीमी हो सकती थी। लेकिन शिवाजी महाराज ने अपनी सैन्य प्रतिभा का परिचय देते हुए सेना को चार टुकड़ियों में बाँट दिया:

सामरिक बचाव: एक टुकड़ी को लूट के माल की सुरक्षा करते हुए सुरक्षित निकालने की जिम्मेदारी दी गई।

अचानक हमला: बाकी टुकड़ियों ने मुगलों पर अलग-अलग दिशाओं से अचानक हमला किया।

घुड़सवारों का कौशल: मराठा घुड़सवारों ने ‘गनीमी कावा’ (छापामार युद्ध) का उपयोग किया। वे मुगलों पर हमला करते और जब मुगल पलटवार करते, तो वे तेजी से पीछे हट जाते, जिससे मुगल सेना भ्रमित हो गई।

“वंचि-दिंडोरी में मराठा घुड़सवारों ने दिखा दिया कि वे न केवल पहाड़ों में छिपकर वार करना जानते हैं, बल्कि खुले मैदान में विशाल मुगल सेना को धूल चटाने की भी क्षमता रखते हैं।” — सर जदुनाथ सरकार

युद्ध के परिणाम और प्रभाव

मुगलों की भारी क्षति: इस युद्ध में मुगलों के कई अनुभवी अधिकारी मारे गए और उनकी सेना तितर-बितर हो गई। इखलास खान बुरी तरह घायल हुआ।

अजेय होने का संदेश: यह पहली बार था जब मराठों ने खुले मैदान (Open Battlefield) में मुगलों की संगठित सेना को निर्णायक रूप से हराया था। इससे पहले माना जाता था कि मराठे केवल किलों और जंगलों में ही लड़ सकते हैं।

स्वराज का विस्तार: इस जीत के बाद खानदेश, बरार और बागलान क्षेत्रों में शिवाजी महाराज का प्रभाव इतना बढ़ गया कि मुगल सेना रक्षात्मक मुद्रा में आ गई।

तुलनात्मक प्रभाव

विशेषता प्रथम आक्रमण (1664) द्वितीय आक्रमण (1670)
मुख्य उद्देश्य सेना हेतु धन जुटाना औरंगजेब को जवाब देना और ‘चौथ’ मांगना
मुगल प्रतिक्रिया शाइस्ता खान की हार का सदमा मुगलों के प्रशासनिक ढांचे का ढहना
मराठा शक्ति एक उभरती हुई शक्ति एक स्थापित और अजेय साम्राज्य
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