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चित्तौड़गढ़ के 3 ऐतिहासिक जौहर: जब अपनी अस्मत बचाने के लिए धधकती आग में कूद गईं हजारों राजपूत महिलाएं

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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मेवाड़ की धरती को यूँ ही ‘वीर प्रसूता भूमि’ नहीं कहा जाता। यह वह पावन क्षेत्र है जहाँ सम्मान, स्वाभिमान और मर्यादा को जीवन से भी ऊपर माना गया। राजस्थान के इतिहास में चित्तौड़गढ़ का किला केवल पत्थरों से बना एक दुर्ग नहीं, बल्कि उन गाथाओं का जीवंत साक्ष्य है, जहाँ राजपूत वीरांगनाओं ने पराजय और अपमान से बेहतर अग्नि में समर्पण को चुना।

इतिहास गवाह है कि चित्तौड़गढ़ ने तीन महाजौहर देखे—जो न केवल राजपूत आन-बान-शान का प्रतीक हैं, बल्कि भारतीय नारी के अदम्य साहस का भी अमर उदाहरण हैं।

? पहला जौहर (1303 ई.) — रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी

सन् 1303 ईस्वी में दिल्ली सल्तनत के शासक अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। इसका मुख्य कारण उसकी साम्राज्यवादी लालसा के साथ-साथ रानी पद्मिनी की सौंदर्य-ख्याति भी मानी जाती है।

राजा रतन सिंह की गिरफ्तारी और युद्ध में वीरगति के बाद, गोरा और बादल जैसे राजपूत योद्धाओं ने छल-बल से राजा को छुड़ाने का प्रयास किया और अद्भुत पराक्रम दिखाया।
अंततः पराजय निश्चित देखकर रानी पद्मिनी के नेतृत्व में लगभग 16,000 राजपूत स्त्रियों ने एक साथ जौहर कर लिया। यह बलिदान इतिहास में स्त्री-सम्मान की सबसे बड़ी मिसालों में गिना जाता है।

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? दूसरा जौहर (1535 ई.) — रानी कर्णावती और बहादुर शाह

16वीं शताब्दी में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया। उस समय मेवाड़ की बागडोर संभाल रहीं थीं रानी कर्णावती

इतिहास की एक अत्यंत भावनात्मक घटना में रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट हुमायूं को रक्षा-सूत्र (राखी) भेजकर सहायता की गुहार लगाई। हुमायूं ने इसे स्वीकार भी किया, किंतु राजनीतिक परिस्थितियों के कारण वे समय पर चित्तौड़ नहीं पहुँच सके।

शत्रु के दुर्ग में प्रवेश से पहले ही रानी कर्णावती ने हजारों राजपूत महिलाओं के साथ जौहर कर लिया। यह घटना भारतीय इतिहास में नारी सम्मान और भ्रातृत्व की अनोखी मिसाल बन गई।

? तीसरा जौहर (1567–68 ई.) — अकबर का चित्तौड़ अभियान

मुगल सम्राट अकबर ने 1567 ई. में चित्तौड़ पर भीषण आक्रमण किया, जो कई महीनों तक चला। इस युद्ध में जयमल और फत्ता (फतेह सिंह) ने अद्वितीय शौर्य दिखाया।

जयमल के घायल होने के बाद भी युद्ध जारी रहा। अंततः जब किले का पतन तय हो गया, तब राजपूत पुरुषों ने शाका किया और स्त्रियों ने तीसरा महाजौहर कर इतिहास में अपने बलिदान को अमर कर दिया।

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यह भी पढ़ें : आक्रांताओं के हाथ लगी सिर्फ राख: जानें जौहर के पीछे का मनोवैज्ञानिक कारण

? रोचक तथ्य | Quick Info Box

तथ्य विवरण
जौहर पराजय की स्थिति में राजपूत स्त्रियों द्वारा सामूहिक अग्नि-प्रवेश
शाका पुरुषों द्वारा केसरिया वस्त्र पहनकर अंतिम युद्ध
जौहर कुंड चित्तौड़गढ़ किले में आज भी मौजूद ऐतिहासिक स्थल
UNESCO दर्जा चित्तौड़गढ़ किला यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल
प्रतीक राजपूत स्वाभिमान, नारी सम्मान और बलिदान

चित्तौड़ के जौहर केवल अतीत की घटनाएँ नहीं, बल्कि राजपूत संस्कृति, नारी शक्ति और आत्मसम्मान के शाश्वत प्रतीक हैं। मेवाड़ की वीरांगनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि जब प्रश्न सम्मान का हो, तब मृत्यु भी एक विजय बन जाती है। चित्तौड़गढ़ का किला आज भी उन जलती चिताओं की गूंज को अपने पत्थरों में समेटे हुए है—जो आने वाली पीढ़ियों को साहस, त्याग और स्वाभिमान का पाठ पढ़ाती रहेंगी।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।