भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही हुए हैं, जिन्होंने निजी वैभव, सामाजिक प्रतिष्ठा और सत्ता के शिखर को स्वेच्छा से त्याग दिया हो। सुभाष चंद्र बोस ऐसे ही क्रांतिकारी राष्ट्रनायक थे, जिनकी आत्मा भारत की गुलामी से व्यथित थी। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा राष्ट्रवाद केवल विचार नहीं, बल्कि साहसिक कर्म की मांग करता है।
आईसीएस जैसी प्रतिष्ठित नौकरी को ठुकराने का ऐतिहासिक साहस
1920 में सुभाष चंद्र बोस ने Indian Civil Service (ICS) परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। उस दौर में आईसीएस अधिकारी बनना किसी भी भारतीय के लिए अपार शक्ति, सम्मान और सुरक्षित भविष्य का प्रतीक माना जाता था।
- अंतरात्मा का निर्णय: ब्रिटिश शासन के प्रति वफादारी की शपथ लेना उन्हें स्वीकार नहीं था। उन्होंने स्पष्ट कहा—
“कोई भी व्यक्ति दो घोड़ों की सवारी नहीं कर सकता।” - 1921 का इस्तीफा: सुभाष चंद्र बोस ने आईसीएस से त्यागपत्र दे दिया। यह केवल नौकरी छोड़ना नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता पर वैचारिक प्रहार था।
- युवाओं के लिए संदेश: उन्होंने साबित किया कि राष्ट्र की सेवा, सत्ता की सेवा से कहीं ऊपर है।
यह निर्णय भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा बन गया और स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा मिली।
स्वामी विवेकानंद से प्रेरित राष्ट्रवादी चेतना
सुभाष चंद्र बोस के विचारों पर स्वामी विवेकानंद का गहरा प्रभाव था। विवेकानंद का व्यावहारिक वेदांत और मानव निर्माण का दर्शन उनके राष्ट्रवाद की नींव बना।
- आध्यात्मिक राष्ट्रवाद: “शक्ति ही जीवन है, निर्बलता मृत्यु” का सिद्धांत सुभाष के संघर्ष का मूल बना।
- दरिद्र नारायण की सेवा: उन्होंने समझा कि वास्तविक स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय से जुड़ी है।
- आत्म-सम्मान का जागरण: विवेकानंद की ओजस्वी वाणी ने सुभाष में वह स्वाभिमान भरा, जिसने उन्हें ब्रिटिश सत्ता के आगे कभी झुकने नहीं दिया।
कांग्रेस में प्रवेश और ‘पूर्ण स्वराज्य’ की स्पष्ट मांग
आईसीएस से इस्तीफे के बाद सुभाष भारत लौटे और चितरंजन दास (देशबंधु) को अपना राजनीतिक गुरु बनाया। इसके पश्चात उनका सक्रिय राजनीतिक जीवन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ा।
- युवा नेतृत्व का उदय: सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस में एक सशक्त युवा धारा विकसित की, जो धीमी सुधार नीति के बजाय निर्णायक संघर्ष चाहती थी।
- डोमिनियन स्टेटस का विरोध: जब कांग्रेस का एक वर्ग ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत स्वायत्तता की बात कर रहा था, तब सुभाष ने निर्भीक होकर पूर्ण स्वराज्य का नारा दिया।
- हरिपुरा अधिवेशन 1938: कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने औद्योगिक विकास, सैन्य सशक्तिकरण और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर ज़ोर दिया—जो उस समय अत्यंत दूरदर्शी सोच थी।
नेताजी का क्रांतिकारी दृष्टिकोण
“इतिहास में कभी भी कोई वास्तविक परिवर्तन केवल चर्चाओं से नहीं आया है।” — सुभाष चंद्र बोस
यह विचार आज भी भारत के युवाओं को कर्म, साहस और नेतृत्व की प्रेरणा देता है।
त्याग से ‘नेताजी’ बनने तक का सफर
सुभाष चंद्र बोस का जीवन इस सत्य को स्थापित करता है कि राष्ट्र के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता। एक आईसीएस अधिकारी से नेताजी बनने तक का उनका सफर, भारत के आत्म-सम्मान, स्वाभिमान और स्वतंत्र चेतना की ऐतिहासिक विजय गाथा है।
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