वाशिंगटन. ईरान और अमेरिका के बीच दशकों से चली आ रही परमाणु तनातनी में एक नया और बड़ा मोड़ आया है। ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री माजिद तख्त-रवांची के ताज़ा बयान ने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। ईरान ने पहली बार खुले तौर पर ‘कंडीशनल ऑफर’ (सशर्त प्रस्ताव) देते हुए अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह बंद करने की इच्छा जताई है।
तेहरान से आई इस खबर ने न केवल वाशिंगटन बल्कि तेल अवीव और खाड़ी देशों को भी चौंका दिया है। डिप्टी विदेश मंत्री माजिद तख्त-रवांची ने स्पष्ट किया है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को ‘डिस्मैटल’ (समाप्त) करने पर विचार कर सकता है, यदि उसकी तीन प्रमुख शर्तें पूरी की जाती हैं:
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आर्थिक हितों की गारंटी: ईरान चाहता है कि उसे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली (SWIFT) और वैश्विक व्यापार तक बिना किसी बाधा के पहुँच मिले।
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सभी प्रतिबंधों की समाप्ति: ट्रंप प्रशासन के समय से लगे ‘मैक्सिमम प्रेशर’ प्रतिबंधों और उसके बाद के सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना पहली शर्त है।
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सुरक्षा का ठोस आश्वासन: ईरान अपनी क्षेत्रीय संप्रभुता और शासन की सुरक्षा के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों से लिखित गारंटी की मांग कर रहा है।
JCPOA से अब तक: एक नजर में इतिहास
ईरान और अमेरिका के संबंध 2015 के बाद से एक ‘रोलरकोस्टर’ की तरह रहे हैं:
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2015 (ऐतिहासिक समझौता): ओबामा प्रशासन के दौरान Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) पर हस्ताक्षर हुए। ईरान ने परमाणु संवर्धन कम किया और बदले में प्रतिबंधों से राहत मिली।
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2018 (ट्रंप का फैसला): तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समझौते को “इतिहास का सबसे बुरा समझौता” बताते हुए अमेरिका को इससे बाहर कर लिया।
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2021-2024 (तनाव का दौर): जो बाइडन प्रशासन के तहत बातचीत फिर शुरू हुई, लेकिन मध्य पूर्व (इजरायल-हमास जंग) के तनाव के कारण कोई ठोस नतीजा नहीं निकला।
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2026 (ताज़ा स्थिति): ईरान अब आर्थिक बदहाली से उबरने के लिए कूटनीति का सहारा ले रहा है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल बाज़ार पर असर
यदि ईरान और अमेरिका के बीच कोई नया समझौता होता है, तो इसका सबसे बड़ा असर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों पर पड़ेगा।
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सस्ता होगा तेल: ईरान के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार में से एक है। प्रतिबंध हटने से बाज़ार में तेल की आपूर्ति बढ़ेगी, जिससे वैश्विक कीमतें गिर सकती हैं।
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भारतीय अर्थव्यवस्था को लाभ: भारत ईरान से तेल का बड़ा खरीदार रहा है। प्रतिबंध हटने पर भारत को सस्ते और आसान भुगतान विकल्पों के साथ तेल मिल सकेगा।
चुनौतियां और इजरायल का रुख
भले ही ईरान ने ‘ऑफर’ दिया है, लेकिन राह में कई रोड़े हैं:
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इजरायल का विरोध: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पहले ही कह चुके हैं कि वे ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु शक्ति नहीं बनने देंगे। उन्हें डर है कि ईरान इस समझौते का इस्तेमाल केवल ‘वक्त खरीदने’ के लिए कर सकता है।
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IAEA की निगरानी: अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के लिए ईरान के अब तक के संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) का हिसाब लगाना एक बड़ी चुनौती होगी।
विशेषज्ञों का मत: “ईरान का यह बयान उसकी गिरती अर्थव्यवस्था को बचाने की एक सोची-समझी कोशिश है। अमेरिका के लिए चुनौती यह है कि वह ईरान पर कितना भरोसा करे और सुरक्षा की क्या गारंटी दे।”
क्या मध्य पूर्व में शांति लौटेगी?
ईरान का यह ‘कंडीशनल ऑफर’ एक नई कूटनीतिक शुरुआत हो सकता है। यदि जो बाइडन या भविष्य का अमेरिकी प्रशासन इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देता है, तो मध्य पूर्व में चल रहे कई प्रॉक्सी वॉर (यमन, लेबनान, सीरिया) में भी कमी आ सकती है। हालांकि, यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि “गारंटी” और “वेरिफिकेशन” के पैमानों पर दोनों देश एक धरातल पर कैसे आते हैं।
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