भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में नालंदा विश्वविद्यालय का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। फिर भी आज एक बड़ा भ्रम लगातार दोहराया जाता है कि नालंदा केवल बौद्ध धर्म की शिक्षा का केंद्र था।
वास्तविकता यह है कि नालंदा अपने समय का विश्वस्तरीय बहुविषयक विश्वविद्यालय था, जिसकी तुलना आधुनिक युग के ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड या टैक्सिला से की जा सकती है।
भ्रम: नालंदा केवल धार्मिक प्रवचनों का केंद्र था
सामान्य धारणा यह है कि नालंदा में केवल भिक्षु रहते थे और वहाँ सिर्फ बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन होता था। इसी कारण इसके वैज्ञानिक, गणितीय और प्रशासनिक योगदान को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
तथ्य: नालंदा अपने समय का ‘आधुनिक विश्वविद्यालय’ था
5वीं से 12वीं शताब्दी के बीच सक्रिय नालंदा विश्वविद्यालय को दुनिया का पहला पूर्ण आवासीय विश्वविद्यालय माना जाता है। यहाँ 8,000 से अधिक छात्र और लगभग 2,000 शिक्षक रहते थे।
चीनी यात्री ह्वेन सांग और इत्सिंग के विवरणों से स्पष्ट होता है कि यहाँ प्रवेश पाना अत्यंत कठिन था। प्रवेश द्वार पर विद्वान परीक्षक प्रश्न पूछते थे और असफल होने वाले विद्यार्थियों को अंदर प्रवेश नहीं मिलता था।
नालंदा में पढ़ाए जाने वाले प्रमुख विषय
- चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद): रोगों की पहचान, औषधीय वनस्पतियाँ और शल्य ज्ञान
- खगोल शास्त्र: ग्रहों की गति, काल गणना और ब्रह्मांडीय सिद्धांत
- गणित: शून्य, दशमलव प्रणाली और जटिल समीकरण
- तर्कशास्त्र (Logic): वाद-विवाद और प्रमाण आधारित चिंतन
- राजनीति व अर्थशास्त्र: राज्य संचालन, कर प्रणाली और कूटनीति
यह स्पष्ट करता है कि नालंदा केवल धर्म नहीं, बल्कि विज्ञान और विवेक का केंद्र था।
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‘धर्मगंज’ पुस्तकालय: ज्ञान का वह महासागर
नालंदा का पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ विश्व के सबसे विशाल प्राचीन पुस्तकालयों में गिना जाता था। इसमें तीन प्रमुख इमारतें थीं—
रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक।
1193 ईस्वी में बख्तियार खिलजी के आक्रमण के दौरान पुस्तकालय में आग लगने की घटना का उल्लेख कई ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है। यह भी वर्णित है कि असंख्य ताड़पत्र और भोजपत्र पांडुलिपियों के कारण आग लंबे समय तक सुलगती रही।
इतिहासकार मानते हैं कि इस घटना में गणित, खगोल, चिकित्सा और दर्शन से जुड़ा अमूल्य ज्ञान नष्ट हुआ।
अंतरराष्ट्रीय शिक्षा का केंद्र
नालंदा की ख्याति भारत तक सीमित नहीं थी। यहाँ
चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, मंगोलिया, श्रीलंका और मध्य एशिया से विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते थे।
महान गणितज्ञ आर्यभट्ट के नालंदा से संबंध को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि नालंदा जैसा शैक्षणिक वातावरण ही ऐसे महान मस्तिष्कों की भूमि तैयार करता था।
नालंदा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं था, बल्कि अपने समय का वैश्विक नॉलेज हब था। इसे किसी एक धर्म तक सीमित करना इसके वैज्ञानिकों, गणितज्ञों और दार्शनिकों की विरासत को कम आंकना है।
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