अक्सर भारत को औपनिवेशिक काल से पहले एक केवल कृषि-प्रधान देश के रूप में पेश किया जाता है, जबकि ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि अंग्रेजों के आगमन से पहले भारत विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक और व्यापारिक अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। 18वीं सदी के मध्य तक भारत का वैश्विक उत्पादन में हिस्सा लगभग 20–25% माना जाता है—जो उस समय किसी भी देश से अधिक था।
🌍 पूर्व-औपनिवेशिक भारत: विश्व अर्थव्यवस्था का इंजन
🧵 वस्त्र उद्योग (Textiles): “बुनी हुई हवा” की धरती
- भारतीय सूती, रेशमी और मलमल कपड़ों की मांग यूरोप, मध्य-पूर्व और अफ्रीका तक थी।
- ढाका की मलमल इतनी महीन होती थी कि यूरोपीय व्यापारी उसे “Woven Air” कहते थे।
- कारीगर-आधारित यह उद्योग ग्रामीण और शहरी—दोनों अर्थव्यवस्थाओं को रोज़गार देता था।
🚢 जहाज निर्माण (Shipbuilding): समुद्री तकनीक में बढ़त
- सूरत, मांडवी, कोचीन जैसे बंदरगाह उन्नत शिपयार्ड्स के लिए प्रसिद्ध थे।
- भारतीय जहाज टीक (Teak) लकड़ी से बनते थे, जो दीर्घायु और समुद्री यात्रा के लिए आदर्श मानी जाती थी।
- ब्रिटिश नौसेना तक ने भारतीय शिपयार्ड्स में बने जहाजों का उपयोग किया।
📈 व्यापार संतुलन (Trade Surplus): भारत—Net Exporter
- भारत सदियों तक Net Exporter रहा।
- रोमन इतिहासकार Pliny the Elder ने लिखा कि भारत से व्यापार के कारण रोम का सोना बाहर जा रहा था—यह भारत की वैश्विक व्यापारिक ताकत का प्रमाण है।
📉 “महान गिरावट” (The Great Drain): 1757 के बाद क्या बदला?
1757 का प्लासी युद्ध भारत के आर्थिक इतिहास का निर्णायक मोड़ था। इसके बाद आई गिरावट संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी औपनिवेशिक नीतियों का परिणाम थी।
🏭 वि-औद्योगिकीकरण (De-industrialization)
- भारतीय कपड़ों पर भारी टैरिफ/टैक्स लगाए गए।
- ब्रिटेन में मशीनों से बने कपड़े भारत में कम या शून्य शुल्क पर उतारे गए।
- नतीजा: बुनकर-कारीगर बेरोज़गार हुए और घरेलू उद्योग टूटता चला गया।
💸 धन की निकासी (Drain of Wealth)
- राष्ट्रवादी अर्थशास्त्री Dadabhai Naoroji ने “Poverty and Un-British Rule in India” में बताया कि
- भारत से वसूला गया कर,
- सैनिक/प्रशासनिक खर्च,
- और व्यापारिक अधिशेष
ब्रिटेन के विकास में लगाया गया।
- इससे भारत में पूंजी निर्माण रुक गया।
🌾 अकाल और कुप्रबंधन
- औपनिवेशिक काल में बार-बार विनाशकारी अकाल पड़े।
- 1943 का बंगाल अकाल प्रशासनिक विफलताओं, अनाज के निर्यात और कुप्रबंधन का दुखद उदाहरण है।
- प्राकृतिक कारणों से अधिक, नीतिगत फैसलों ने मानवीय संकट को गहरा किया।
🔎 तथ्य जो इतिहास को समझाते हैं
- 1700 के आसपास भारत का वैश्विक GDP हिस्सा ~23% (अनुमान)।
- 1947 तक यह हिस्सा 2–3% के आसपास सिमट गया।
- औपनिवेशिक नीतियों ने स्थानीय उद्योग, पूंजी और खपत—तीनों को कमजोर किया।
पूर्व-औपनिवेशिक भारत आत्मनिर्भर, औद्योगिक और समृद्ध था। 1757 के बाद आई “महान गिरावट” किसी अक्षमता की कहानी नहीं, बल्कि औपनिवेशिक शोषण और धन-निकासी का परिणाम थी। यह इतिहास आज भी सिखाता है कि आर्थिक स्वतंत्रता—राजनीतिक स्वतंत्रता जितनी ही आवश्यक है।
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