भारतीय इतिहास के पन्नों में कई ऐसे युद्ध दर्ज हैं जिन्होंने देश की नियति तय की। ऐसा ही एक युद्ध था ‘बरारी घाट का युद्ध’। यह युद्ध न केवल मराठों के अदम्य साहस का प्रतीक है, बल्कि यह उस शृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी है जो अंततः पानीपत के तीसरे युद्ध (1761) का कारण बनी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
18वीं शताब्दी के मध्य में मराठा साम्राज्य अपनी शक्ति के चरम पर था। ‘अटक से कटक’ तक उनका प्रभाव फैल चुका था। मराठों ने पंजाब से अहमद शाह अब्दाली के प्रतिनिधियों को खदेड़ दिया था, जिससे क्रोधित होकर अब्दाली ने भारत पर पुन: आक्रमण करने का निश्चय किया। उस समय उत्तर भारत में मराठा सेना का नेतृत्व दत्ताजी शिंदे (महादजी शिंदे के बड़े भाई) कर रहे थे।
युद्ध का घटनाक्रम (9 जनवरी 1760)
अहमद शाह अब्दाली अपनी विशाल सेना और भारी तोपखाने के साथ दिल्ली की ओर बढ़ रहा था। उसे स्थानीय रोहिल्ला सरदार नजीब-उद-दौला का गुप्त समर्थन प्राप्त था। दत्ताजी शिंदे अपनी सेना के साथ दिल्ली के पास यमुना नदी के किनारे बरारी घाट पर अब्दाली को रोकने के लिए तैनात थे।
अचानक हमला: 9 जनवरी की सुबह घना कोहरा छाया हुआ था। नजीब-उद-दौला की मदद से अफगानी सेना ने नदी के एक छिपे हुए रास्ते को पार किया और मराठा खेमे पर अचानक धावा बोल दिया।
असमान संघर्ष: मराठों की संख्या अफगानों की तुलना में कम थी और वे इस अचानक हमले के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे। इसके बावजूद, दत्ताजी शिंदे ने पीछे हटने के बजाय वीरतापूर्वक लड़ने का निर्णय लिया।
दत्ताजी शिंदे का अमर बलिदान
युद्ध के दौरान दत्ताजी शिंदे वीरता से लड़ते हुए गंभीर रूप से घायल होकर घोड़े से गिर गए। जब वे रक्त रंजित अवस्था में भूमि पर पड़े थे, तब नजीब-उद-दौला के सहयोगी कुतुब शाह ने उनके पास आकर उपहास करते हुए पूछा:
“क्यों पटेल! और लड़ोगे?”
अत्यंत पीड़ा और मृत्यु के करीब होने के बावजूद, दत्ताजी ने अपनी गर्दन उठाकर गर्व से उत्तर दिया:
“हाँ! बचेंगे तो और भी लड़ेंगे।”
दत्ताजी के इन शब्दों ने मराठा इतिहास में उन्हें अमर कर दिया। इसके तुरंत बाद कुतुब शाह ने उनका सिर धड़ से अलग कर दिया।
युद्ध के परिणाम और प्रभाव
रणनीतिक क्षति: मराठों ने अपना एक अत्यंत योग्य और साहसी सेनापति खो दिया।
अब्दाली का दिल्ली प्रवेश: इस जीत के बाद अब्दाली के लिए दिल्ली का मार्ग प्रशस्त हो गया और उसने राजधानी पर कब्जा कर लिया।
पानीपत की भूमिका: जब दत्ताजी की मृत्यु का समाचार पुणे पहुँचा, तो पेशवा बालाजी बाजीराव ने सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में एक विशाल सेना उत्तर की ओर भेजी। यही तनाव आगे चलकर 1761 के पानीपत के तीसरे युद्ध में तब्दील हुआ।
बरारी घाट का युद्ध केवल एक सैन्य हार नहीं थी, बल्कि यह भारतीय योद्धाओं के उस चरित्र का दर्शन था जहाँ वे अंतिम सांस तक झुकने को तैयार नहीं थे। दत्ताजी शिंदे का वह वाक्य—“बचेंगे तो और भी लड़ेंगे”—आज भी वीरता और कभी न हार मानने वाले जज्बे की मिसाल माना जाता है।
भौगोलिक लाभ और ‘फोर्ड’ (नदी का उथला रास्ता) की खोज
रणनीतिक दृष्टि से यह युद्ध पूरी तरह नदी पार करने की तकनीक पर आधारित था।
अब्दाली की रणनीति: अहमद शाह अब्दाली जानता था कि सामने से हमला करना जोखिम भरा हो सकता है। उसने स्थानीय रोहिल्लाओं (नजीब-उद-दौला) की मदद से यमुना नदी के एक ऐसे उथले हिस्से (Ford) का पता लगाया, जिसके बारे में मराठों को जानकारी नहीं थी।
मराठा चूक: दत्ताजी शिंदे ने यमुना को एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना था। उन्हें लगा था कि सर्दी और बढ़े हुए जलस्तर के कारण अफगान नदी पार नहीं कर पाएंगे। सुरक्षा में इसी ढील का फायदा अब्दाली को मिला।
हथियारों और युद्ध शैली का अंतर
अफगान गोलाबारी: अब्दाली के पास ‘जम्बूरक’ (ऊंटों पर रखी छोटी तोपें) और उन्नत मस्कट (बंदूकें) थीं, जो कोहरे और उबड़-खाबड़ घाटों पर बहुत प्रभावी थीं।
मराठा छापामार युद्ध बनाम आमने-सामने की जंग: मराठे ‘गनिमी कावा’ (छापामार युद्ध) में निपुण थे, लेकिन बरारी घाट पर वे एक सीमित जगह में फंस गए थे जहाँ वे अपनी गतिशीलता (Mobility) का उपयोग नहीं कर सके।
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