लखनऊ | गुरुवार, 9 अप्रैल 2026
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मदरसों को लेकर एक बार फिर सियासी पारा चढ़ गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार द्वारा वर्ष 2016 में लाए गए ‘उत्तर प्रदेश मदरसा (अध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन का भुगतान) विधेयक’ को वापस लेने की प्रक्रिया तेज कर दी है। ताजा जानकारी के अनुसार, सरकार इस विधेयक को रद्द करने या इसमें बड़े संशोधन करने के लिए इसे आगामी सत्र में विधानसभा और विधान परिषद के पटल पर रखेगी।
क्या है 2016 का विवादित मदरसा विधेयक?
सपा सरकार के कार्यकाल में पारित इस विधेयक में मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान को लेकर कड़े प्रावधान थे। विवाद की मुख्य वजह इसकी वह धाराएं थीं, जो मदरसा शिक्षकों को एक तरह का ‘कानूनी कवच’ प्रदान करती थीं।
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अधिकारियों पर कार्रवाई: इस बिल के मुताबिक, यदि मदरसा शिक्षकों के वेतन में देरी होती, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सीधे आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जा सकते थे।
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संवैधानिक आपत्ति: तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने इस पर आपत्ति जताते हुए इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया था। तर्क यह था कि यह विधेयक समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है और एक विशिष्ट वर्ग को असीमित अधिकार देता है।
योगी सरकार का पक्ष और नई तैयारी
सूत्रों और सरकारी बयानों के अनुसार, सरकार इस पुराने कानून को मौजूदा शिक्षा सुधारों के अनुरूप नहीं मानती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘यूपी मदरसा बोर्ड एक्ट 2004’ की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखे जाने के बाद, राज्य सरकार अब नियमावली में पारदर्शिता लाना चाहती है।
“सरकार का लक्ष्य मदरसों में आधुनिक शिक्षा (विज्ञान, गणित) को बढ़ावा देना है, न कि किसी विशेष वर्ग को ऐसे अधिकार देना जो प्रशासनिक व्यवस्था में बाधा डालें।” — सूत्रों के मुताबिक
विपक्ष और धर्मगुरुओं की तीखी प्रतिक्रिया
इस फैसले के सामने आते ही समाजवादी पार्टी (सपा) और मुस्लिम संगठनों ने इसे ‘चुनावी एजेंडा’ करार दिया है।
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मुस्लिम धर्मगुरु सैफ अब्बास ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “यदि सरकार बुनियादी सुविधाएं और वेतन सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकती, तो उसे संस्थाओं के आंतरिक ढांचे में हस्तक्षेप करने का कोई हक नहीं है।”
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सपा का आरोप: विपक्ष का कहना है कि सरकार शिक्षकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है और यह कदम हजारों परिवारों को आर्थिक संकट में डाल सकता है।
आगे क्या होगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के राजनीतिक माहौल में यह मुद्दा एक बड़ा ध्रुवीकरण का केंद्र बन सकता है।
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विधानसभा में बहस: जब यह विधेयक पुनर्विचार के लिए सदन में आएगा, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक तय है।
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नई नियमावली: सरकार 2016 की नियमावली के स्थान पर अधिक ‘सख्त और पारदर्शी’ शिक्षक भर्ती एवं निगरानी प्रणाली लाने की योजना बना रही है।
मुख्य बिंदु:
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योगी सरकार 2016 के मदरसा वेतन विधेयक को विधानमंडल में पुनर्विचार के लिए पेश करेगी।
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विधेयक में शिक्षकों को मिलने वाले ‘असीमित कानूनी संरक्षण’ पर थी आपत्ति।
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समाजवादी पार्टी और मुस्लिम धर्मगुरुओं ने सरकार के इस कदम को बताया ‘शिक्षा विरोधी’।
निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश में मदरसों का आधुनिकीकरण बनाम कानूनी अधिकार की यह जंग अब विधानसभा के गलियारों में लड़ी जाएगी। राज्य के हजारों शिक्षकों की निगाहें अब सदन के अगले फैसले पर टिकी हैं।
Matribhumisamachar


