कानपुर. उत्तर प्रदेश के औद्योगिक शहर कानपुर की लाइफलाइन कही जाने वाली सीएनजी (CNG) सिटी बसों के पहिये क्या थमे, शहर की रफ्तार के साथ-साथ सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी भी संकट में पड़ गई है। अक्टूबर 2025 से कंडम घोषित कर बंद की गई इन बसों के कारण अब तक परिवहन विभाग को 18 करोड़ रुपये से अधिक के राजस्व का चूना लग चुका है।
15 साल का सफर खत्म, बेरोजगारी शुरू
शहर में वर्ष 2009 से 2011 के बीच शुरू हुई करीब 250 से अधिक सीएनजी बसें अपनी 15 साल की मियाद पूरी कर चुकी हैं। नियमानुसार इन बसों को अक्टूबर 2025 में सड़क से हटाकर नीलामी की प्रक्रिया में डाल दिया गया। लेकिन विभाग की दूरदर्शिता की कमी कहें या सुस्ती, इन पुरानी बसों की जगह नई बसों की खेप अब तक शहर नहीं पहुंची। नतीजा यह है कि इन बसों को चलाने वाले सैकड़ों संविदा ड्राइवर और कंडक्टर अब बेरोजगार होकर अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं।
यात्रियों की जेब ढीली, डग्गेमारों की चांदी
इन सिटी बसों का किराया 1 रुपये प्रति किलोमीटर से भी कम था, जो आम जनता के लिए बेहद किफायती था। ये बसें न केवल शहर, बल्कि ग्रामीण इलाकों जैसे बिंदकी, पुखरायां, भोगनीपुर, बिल्हौर, घाटमपुर और जहानाबाद को जोड़ती थीं। बसों के बंद होने से:
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यात्रियों को डग्गेमार वाहनों (निजी डग्गामारों) में मजबूरन सफर करना पड़ रहा है।
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किराए में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे दैनिक यात्रियों का बजट बिगड़ गया है।
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शहर की कनेक्टिविटी पूरी तरह प्रभावित हुई है।
राजस्व का गणित: हर दिन 20 लाख का नुकसान
विभाग के आंकड़ों के अनुसार, एक बस से प्रतिदिन औसतन 5 से 8 हजार रुपये की आय होती थी। 250 बसों के हिसाब से विभाग को हर दिन करीब 20 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त होता था। अक्टूबर से अब तक यह आंकड़ा 18 करोड़ रुपये को पार कर गया है, जो सीधे तौर पर सरकारी खजाने को चपत है।
कर्मचारियों का प्रदर्शन: “साहब, समायोजन कब होगा?”
विकास नगर स्थित क्षेत्रीय परिवहन निगम के कार्यालय में आज कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर धरना दिया। कर्मचारियों का कहना है कि:
“यूपीएसआरटीसी (UPSRTC) के एमडी ने हमारा समायोजन करने के निर्देश दिए थे, लेकिन स्थानीय अधिकारी इस पर कुंडली मारकर बैठे हैं। हम सड़क पर आ गए हैं।”
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
कानपुर के क्षेत्रीय प्रबंधक महेश के अनुसार, ये बसें तकनीकी रूप से KCBS (कानपुर सिटी बस सर्विस) के अधीन थीं, जो नगरीय निदेशालय का हिस्सा है। हालांकि 2009-2011 के कर्मचारी परिवहन विभाग के माध्यम से रखे गए थे, लेकिन बसों की अवधि समाप्त होने के बाद अब गेंद शासन के पाले में है। उन्होंने कहा कि विभाग से पत्राचार किया जा रहा है और निर्देश मिलते ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।
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