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भारतीय विमानन अधिनियम 2024: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से 2 सप्ताह में मांगे नियम, हवाई किराए में ‘लूट’ पर जताई कड़ी चिंता

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मुंबई । मंगलवार, 14 जुलाई 2026

भारत के नागरिक उड्डयन (विमानन) क्षेत्र में पारदर्शिता, यात्री सुरक्षा और मनमाने हवाई किरायों पर लगाम लगाने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सख्त निर्देश दिया है कि वह नए भारतीय विमानन अधिनियम, 2024 के तहत तैयार किए गए नियमों को अगले दो सप्ताह के भीतर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करे।

न्यायामूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि इन नियमों को एक सीलबंद लिफाफे में अदालत के सामने रखा जाए, चाहे इन्हें अभी तक संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया हो या नहीं। यह आदेश सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान आया।

क्या है पूरा मामला और याचिकाकर्ता की मांगें?

याचिकाकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन ने देश के विमानन क्षेत्र में निजी एयरलाइनों की मनमानी और नियामक (Regulator) की निष्क्रियता को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दों को रेखांकित किया गया है:

  1. एक सशक्त और स्वतंत्र नियामक की मांग: वर्तमान में निजी एयरलाइनों द्वारा लगाए जाने वाले शुल्कों और हवाई किरायों में “अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव” को नियंत्रित करने के लिए एक मजबूत स्वतंत्र तंत्र की आवश्यकता है।

  2. डायनेमिक प्राइसिंग (Dynamic Pricing) का विरोध: त्योहारों, छुट्टियों या मौसम के खराब होने के दौरान एयरलाइंस द्वारा किराए में की जाने वाली बेतहाशा बढ़ोतरी को नागरिकों के समानता और आवागमन की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन बताया गया है।

  3. मुफ्त बैगेज सीमा में कटौती: याचिका में आरोप लगाया गया कि निजी एयरलाइनों ने बिना किसी ठोस कारण के इकोनॉमी क्लास के यात्रियों के लिए मुफ्त चेक-इन बैगेज भत्ता 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दिया है, जिससे यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: किराए में बढ़ोतरी को बताया “शोषण”

मामले की पिछली सुनवाइयों के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हवाई किरायों में एयरलाइंस द्वारा की जाने वाली मनमानी वृद्धि पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। कोर्ट ने इसे यात्रियों का “शोषण” करार दिया था और केंद्र सरकार व नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) से इस पर जवाब मांगा था। अदालत ने हवाई किरायों में युक्तिकरण (Rationalization) की आवश्यकता पर जोर देते हुए सरकार से आम यात्रियों को राहत देने को कहा है।

केंद्र सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को सूचित किया कि नया विमानन अधिनियम जनवरी 2025 से प्रभावी हो चुका है। सरकार ने बताया कि नए अधिनियम के तहत नियमों का मसौदा (Draft) पूरी तरह तैयार है और वर्तमान में इसके विभिन्न भाषाओं में अनुवाद की प्रक्रिया चल रही है। सरकार के अनुसार, इन नियमों को संसद के समक्ष रखना अनिवार्य है, जिसके जवाब में कोर्ट ने संसद में पेश होने से पहले ही इसे सीलबंद लिफाफे में कोर्ट को सौंपने का आदेश दिया।

इस मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को तय की गई है। तब तक वरिष्ठ अधिवक्ता रविंद्र श्रीवास्तव के अनुसार, नागरिक उड्डयन क्षेत्र में पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: भारतीय विमानन अधिनियम 2024 का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर: इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य भारत के नागरिक उड्डयन (Aviation) क्षेत्र का आधुनिकीकरण करना, परिचालन में पारदर्शिता लाना और हवाई किराए व यात्री सुरक्षा के लिए नए व्यावहारिक नियम स्थापित करना है।

प्रश्न 2: सुप्रीम कोर्ट ने नियमों को सीलबंद लिफाफे में क्यों मांगा है?

उत्तर: अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नए नियमों में हवाई किराए के अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव और यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं, भले ही वे अभी संसद में पारित हुए हों या नहीं।

प्रश्न 3: एयरलाइंस की चेक-इन बैगेज नीति पर क्या विवाद है?

उत्तर: याचिका के अनुसार, एयरलाइंस ने मुफ्त चेक-इन बैगेज की सीमा को 25 किलोग्राम से घटाकर 15 किलोग्राम कर दिया है और केवल एक बैग ले जाने की अनुमति दी है। यात्री इसे एकतरफा और शोषणकारी नीति मान रहे हैं।

Disclaimer: यह लेख उपलब्ध समाचार स्रोतों और न्यायालय की कार्यवाही के विवरण पर आधारित है। विमानन नियमों और सरकारी नीतियों में बदलाव के लिए आधिकारिक नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA) की अधिसूचनाओं को देखें।

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