मुंबई | शुक्रवार, 14 अगस्त 2026
वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और जियोपॉलिटिक्स में एक बड़ा मोड़ देखने को मिला है। जुलाई 2026 में भारत की रूसी कच्चे तेल (Crude Oil) पर निर्भरता अब तक के सबसे उच्चतम स्तर (Record High) पर पहुँच गई है। सरकारी और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, जुलाई महीने में भारत के कुल क्रूड ऑयल आयात में अकेले रूस की हिस्सेदारी 50.83% दर्ज की गई। यह इतिहास में पहली बार है जब भारत की कुल तेल खरीद में किसी एक देश का हिस्सा आधे से भी अधिक हो गया है।
खरीद के आंकड़े: जुलाई 2026 में बना नया रिकॉर्ड
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प्रतिदिन की खरीद: जुलाई 2026 में भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने रूस से औसतन 2.47 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bpd) कच्चा तेल खरीदा।
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वार्षिक वृद्धि (YoY Increase): जुलाई 2025 की तुलना में इस साल रूसी क्रूड आयात में 62.4% की जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है।
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वित्त वर्ष 2026-27 की स्थिति: अप्रैल से जुलाई 2026 की चार महीने की अवधि में भारत के कुल आयात में रूस का औसत शेयर 43.25% रहा, जो पिछले साल इसी अवधि में लगभग 37% था।
मिडिल ईस्ट संकट और भारतीय रिफाइनरों की रणनीति
मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के देशों में लगातार बढ़ रहे भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधानों (Supply Disruptions) ने भारतीय रिफाइनरी कंपनियों को अपने स्रोतों में बदलाव करने पर मजबूर किया।
इराक और सऊदी अरब जैसे पारम्परिक आपूर्तिकर्ताओं से निर्भरता घटाकर भारतीय रिफाइनरों ने प्रतिस्पर्धी और रियायती दरों (Discounted Rates) पर मिल रहे रूसी क्रूड को प्राथमिकता दी।
अन्य आपूर्तिकर्ता देशों का गणित बदल गया:
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मध्य पूर्व (Middle East): अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच मिडिल ईस्ट देशों का भारत के तेल आयात में शेयर गिरकर मात्र 30% रह गया, जो पिछले साल 43% था।
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लैटिन अमेरिका (Latin America): ब्राजील (Brazil) और वेनेजुएला (Venezuela) जैसे देशों से भारत की खरीद बढ़ी है और लैटिन अमेरिकी तेल की हिस्सेदारी बढ़कर 12.7% पहुँच गई है।
भारत के लिए क्यों रणनीतिक है रूसी कच्चा तेल?
भारत अपनी कच्चा तेल जरूरतों का लगभग 90% से अधिक हिस्सा आयात करता है। ऐसे में देश के अंदर पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनाए रखने और मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रण में रखने के लिए रियायती दरों पर ऊर्जा संसाधन जुटाना भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) की प्राथमिकता है।
फरवरी 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए, तो रूस ने अपने बाजार को एशिया की तरफ मोड़ा। भारत ने इस अवसर का कुशल कूटनीतिक और आर्थिक उपयोग करते हुए अपनी सप्लाई चेन को मजबूत किया।
भावी चुनौतियाँ और जियोपॉलिटिकल जोखिम (Geopolitical Risks)
रूसी तेल पर 50% से अधिक निर्भरता भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद तो है, लेकिन यह कई अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक चुनौतियाँ भी खड़ी करती है:
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अमरीकी और यूरोपीय दबाव: अमरीका और जी-7 (G7) देश लगातार रूसी ऊर्जा निर्यात पर नए टैरिफ और प्रतिबंध लगा रहे हैं।
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द्वितीयक प्रतिबंध (Secondary Sanctions): रूसी शिपिंग कंपनियों या ‘शैडो फ्लीट’ पर यदि अमरीकी सीनेट और यूरोपीय संघ कड़े प्रतिबंध लागू करते हैं, तो भारतीय बैंकों और रिफाइनरियों के लिए भुगतान तंत्र बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
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आपूर्ति में विविधता (Diversification): भविष्य में किसी भी अचानक आए संकट से निपटने के लिए भारत को रूस के साथ-साथ मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से क्रूड खरीद के बीच एक मजबूत संतुलन बनाकर रखना होगा।
निष्कर्ष
जुलाई 2026 के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि वर्तमान में रूस, भारत की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला (Energy Supply Chain) की सबसे मुख्य रीढ़ बना हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक दबावों के बावजूद, भारत ने यह साबित किया है कि उसके राष्ट्रीय हित और नागरिकों को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना उसकी विदेश नीति का केंद्र बिंदु है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: जुलाई 2026 में भारत ने रूस से कितना कच्चा तेल आयात किया?
उत्तर: जुलाई 2026 में भारत ने रूस से औसतन 2.47 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bpd) कच्चा तेल आयात किया, जो भारत के कुल क्रूड ऑयल आयात का 50.83% है।
Q2: क्या भारत के तेल आयात में मिडिल ईस्ट का शेयर कम हुआ है?
उत्तर: हाँ, अप्रैल-जुलाई 2026 के दौरान मिडिल ईस्ट देशों का भारतीय तेल आयात में हिस्सा घटकर लगभग 30% पर आ गया है, जो पिछले वर्ष समान अवधि में 43% था।
Q3: भारत अपनी जरूरत का कितना तेल आयात करता है?
उत्तर: भारत अपनी घरेलू कच्चे तेल की कुल खपत का 90% से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख उपलब्ध व्यापारिक आंकड़ों, सरकारी बयानों और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों (जैसे Reuters, CREA और GTRI रिपोर्ट) के आधार पर तैयार किया गया है। बाजार की स्थितियां और अंतरराष्ट्रीय नीतियां भविष्य में इन आंकड़ों को प्रभावित कर सकती हैं।
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