कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘सिंगूर’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन का वह ऐतिहासिक केंद्र है जिसने 2011 में 34 साल के वामपंथी शासन का अंत किया था। अब, 18 साल बाद, भाजपा इसी ‘सिंगूर की जमीन’ से ममता बनर्जी के खिलाफ उनके ही पुराने हथियार को आजमाने की तैयारी में है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 18 जनवरी 2026 को सिंगूर के ‘सिंघेर भेरी’ मौजा में होने वाली विशाल रैली इसी रणनीतिक बदलाव का शंखनाद है।
1. सिंगूर मुद्दा: क्यों फिर से जीवित कर रही है भाजपा?
2006 में टाटा नैनो प्रोजेक्ट के खिलाफ ममता बनर्जी के आंदोलन ने उन्हें सत्ता तक पहुँचाया, लेकिन भाजपा अब इसे “खोया हुआ औद्योगिक अवसर” (Lost Opportunity) बताकर पेश कर रही है।
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टाटा की वापसी का वादा: भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार और केंद्रीय नेतृत्व ने नारा दिया है— “अगर भाजपा आई, तो टाटा को सिंगूर वापस लाएगी।” * औद्योगिक ठहराव का आरोप: भाजपा का तर्क है कि सिंगूर से टाटा के जाने के बाद बंगाल में कोई बड़ा औद्योगिक निवेश नहीं आया, जिससे राज्य का युवा पलायन करने को मजबूर है।
2. भाजपा की रणनीति: ‘विकास बनाम विनाश’
2026 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा ने अपनी रणनीति के केंद्र में ‘भद्रलोक’ और ‘युवा’ वोट बैंक को रखा है:
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भावना बनाम रोजगार: भाजपा सिंगूर को ‘किसानों की जीत’ के बजाय ‘रोजगार की हार’ के रूप में ब्रांड कर रही है।
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बिहार मॉडल का जिक्र: बिहार चुनाव 2025 में एनडीए की जीत के बाद, पीएम मोदी अब बंगाल में ‘जंगल राज’ बनाम ‘विकास राज’ की तुलना कर रहे हैं।
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तुलनात्मक नैरेटिव: भाजपा यह संदेश दे रही है कि जो नैनो प्रोजेक्ट बंगाल से निकला, उसने गुजरात (सानंद) की तस्वीर बदल दी, जबकि सिंगूर की जमीन आज भी बंजर और विवादों में है।
3. TMC का पलटवार: ‘सुप्रीम कोर्ट और स्वाभिमान’
तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे पर रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक है। पार्टी का कहना है:
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कानूनी जीत: ममता बनर्जी अक्सर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का हवाला देती हैं जिसमें जमीन अधिग्रहण को अवैध माना गया था।
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किसानों का हक: टीएमसी का तर्क है कि सिंगूर का आंदोलन केवल टाटा के खिलाफ नहीं, बल्कि जबरन जमीन छीनने के खिलाफ था।
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