भारतीय संवैधानिक इतिहास में 42वें संविधान संशोधन (1976) को ‘लघु संविधान’ (Mini Constitution) कहा जाता है। आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लाया गया यह संशोधन मात्र कानूनी बदलाव नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक बिसात थी।
1. वैचारिक नैरेटिव: ‘समाजवाद’ और ‘पंथनिरपेक्षता’ का समावेश
प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ (Socialist) और ‘पंथनिरपेक्ष’ (Secular) शब्दों को जोड़ना एक मास्टरस्ट्रोक माना जाता है। इसके पीछे के मुख्य कारण थे:
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राजनीतिक छवि का पुनर्निर्माण: आपातकाल के दौरान नागरिक अधिकारों के दमन और प्रेस पर सेंसरशिप के कारण सरकार की छवि एक ‘तानाशाह’ की बन गई थी। इन शब्दों के माध्यम से इंदिरा गांधी ने वैश्विक और घरेलू स्तर पर यह संदेश दिया कि उनकी सरकार गरीबों (समाजवाद) और अल्पसंख्यकों (पंथनिरपेक्षता) के प्रति समर्पित है।
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क्षतिपूर्ति की राजनीति: आपातकाल के दौरान हुए ‘जबरन नसबंदी’ और ‘झुग्गी-झोपड़ी हटाओ’ जैसे अभियानों ने आम जनता में रोष पैदा कर दिया था। संविधान में इन शब्दों को शामिल करना उस आक्रोश को शांत करने और सरकार को ‘कल्याणकारी’ दिखाने का प्रयास था।
2. वोट बैंक और विपक्षी दलों पर प्रहार
इस संशोधन ने विपक्ष की वैचारिक जमीन को कमजोर करने का काम किया:
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दक्षिणपंथी दलों की घेराबंदी: ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़कर भारतीय जनसंघ जैसे दलों को ‘सांप्रदायिक’ घोषित करने का आधार तैयार किया गया।
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समाजवाद का एकाधिकार: ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ने से स्वतंत्र पार्टी और अन्य उदारवादी दलों की नीतियों को ‘जन-विरोधी’ या ‘संविधान-विरोधी’ साबित करना आसान हो गया। यह नैरेटिव कंट्रोल की एक उत्कृष्ट मिसाल थी।
3. सत्ता का केंद्रीकरण और न्यायपालिका पर अंकुश
42वें संशोधन का सबसे विवादित हिस्सा वह था जिसने संसद की शक्ति को असीमित करने का प्रयास किया:
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न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का गला घोंटना: 1973 के ‘केशवानंद भारती’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद संविधान के ‘मूल ढांचे’ को नहीं बदल सकती। इंदिरा गांधी ने इस संशोधन के माध्यम से यह प्रावधान किया कि संविधान संशोधन को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
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शक्तियों का असंतुलन: इसके तहत राज्य सूची के कई विषयों को समवर्ती सूची में डाल दिया गया (जैसे शिक्षा और वन), जिससे केंद्र सरकार राज्यों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली हो गई।
4. राजनीतिक अवसरवाद और जनता की अनुपस्थिति
यह संशोधन एक ऐसे समय में किया गया जब लोकतंत्र अपने ‘अंधकार काल’ में था:
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शून्य विपक्ष: अधिकांश विपक्षी नेता जेलों में थे।
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निष्प्रभावी संसद: संसद में कोई सार्थक बहस संभव नहीं थी क्योंकि प्रेस पर सेंसरशिप थी और असहमति की कोई जगह नहीं थी।
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नैतिकता का प्रश्न: आलोचकों का तर्क है कि जिस संसद का कार्यकाल खुद आपातकाल के दौरान बढ़ाया गया था, उसे संविधान में इतने मौलिक परिवर्तन करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं था।
5. विडंबना: अधिकार बनाम शब्द
एक तरफ प्रस्तावना में ‘स्वतंत्रता’ और ‘न्याय’ की बात करने वाले शब्द जोड़े जा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ ‘हेबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) जैसे मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था। यानी, संविधान की ‘आत्मा’ (प्रस्तावना) को सजाया जा रहा था, जबकि उसकी ‘देह’ (नागरिक अधिकार) पर प्रहार हो रहा था।
42वां संशोधन इंदिरा गांधी की सत्ता को वैधानिक और वैचारिक रूप से सुरक्षित करने का एक प्रयास था। हालाँकि 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने 44वें संशोधन के माध्यम से इसकी कई हानिकारक धाराओं को उलट दिया, लेकिन प्रस्तावना में जोड़े गए शब्द आज भी भारतीय राजनीति की धुरी बने हुए हैं।
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