यरुशलम । सोमवार, 15 जून 2026
मध्य पूर्व (Middle East) की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच युद्ध को समाप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक समझौता (Memorandum of Understanding) तय हो गया है। इसके तहत जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलने और दोनों देशों के बीच तनाव कम करने पर सहमति बनी है। लेकिन इस ऐतिहासिक कूटनीतिक प्रगति के बीच, अमेरिका के सबसे भरोसेमंद सहयोगी इजराइल ने बगावती तेवर अख्तियार कर लिए हैं।
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि उनका देश अमेरिका और ईरान के बीच हुए इस समझौते को मानने के लिए कतई बाध्य नहीं है। नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सीधे फोन कर दो टूक शब्दों में अपनी नाराजगी जाहिर की है और स्पष्ट किया है कि इजराइली सेना (IDF) लेबनान में बनाए गए ‘सुरक्षा क्षेत्र’ (Security Zone) से पीछे नहीं हटेगी।
इजराइल की शर्तों की अनदेखी: आखिर क्यों खुद को ठगा महसूस कर रहा है तेल अवीव?
यह कूटनीतिक कदम इजराइल के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। दरअसल, जब अमेरिका और ईरान के बीच इस बेहद संवेदनशील समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी, तब इजराइल को इस पूरी प्रक्रिया से व्यावहारिक रूप से बाहर रखा गया। तेल अवीव (Tel Aviv) की प्रमुख मांगों को इस समझौते में जगह नहीं मिली, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क पर चुप्पी: इजराइल की शर्त थी कि इस डील में ईरान समर्थित सशस्त्र समूहों (जैसे हिजबुल्लाह और हमास) को पूरी तरह खत्म करने का रोडमैप शामिल हो, जिसे अनदेखा कर दिया गया।
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लंबी दूरी की मिसाइलों पर रोक नहीं: ईरान के बैलिस्टिक और लंबी दूरी के मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह रोकने की इजराइल की मांग को समझौते में शामिल नहीं किया गया है।
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हिजबुल्लाह के हमलों की कोई गारंटी नहीं: समझौते के तहत इजराइल से लेबनान पर हमले रोकने और सेना हटाने की उम्मीद की जा रही है, लेकिन दूसरी तरफ से इजराइल पर हिजबुल्लाह के हमले पूरी तरह रुकेंगे, इसकी कोई पुख्ता अंतरराष्ट्रीय गारंटी नहीं दी गई है।
नेतन्याहू के लिए यह समझौता उनकी ‘सबसे बड़ी हार’ क्यों माना जा रहा है?
जानकारों का मानना है कि बेंजामिन नेतन्याहू की घरेलू और क्षेत्रीय राजनीति के लिए यह स्थिति बेहद असहज करने वाली है। इसके पीछे 4 प्रमुख कारण हैं:
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कूटनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ना: युद्ध के दौरान हर कदम पर अमेरिका का साथ मांगने वाले इजराइल को अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण क्षण में वॉशिंगटन ने अकेला छोड़ दिया। अमेरिकी प्रशासन ने इजराइल के हितों से ऊपर अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों (जैसे वैश्विक तेल आपूर्ति बहाल करना) को तरजीह दी।
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‘विरोध की धुरी’ (Axis of Resistance) का बने रहना: युद्ध की शुरुआत में पीएम नेतन्याहू ने दावा किया था कि वे मध्य पूर्व में ईरान के पूरे ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ का तख्तापलट कर देंगे और दुश्मनों को कुचल देंगे। लेकिन हकीकत यह है कि ईरान में इस्लामिक गणराज्य की सरकार मजबूती से टिकी हुई है और लेबनान में हिजबुल्लाह का प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
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भारी भरकम वित्तीय और सैन्य नुकसान: इस पूरे सैन्य अभियान में इजराइल ने लगभग 12 अरब डॉलर (करीब 1000 अरब रुपये) खर्च किए और बड़ी संख्या में सैनिकों का नुकसान उठाया। इतनी भारी कीमत चुकाने के बाद भी इजराइल को वह सुरक्षात्मक बढ़त नहीं मिली जिसकी उम्मीद थी।
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ट्रंप के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में अपने बयानों में इजराइली नेतृत्व के फैसलों की खुले तौर पर आलोचना की है। ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि “मेरी वजह से इजराइल का अस्तित्व है”, जिसका नेतन्याहू की तरफ से कोई ठोस राजनीतिक जवाब नहीं दिया जा सका है।
बड़ा सवाल: अब आगे क्या होगा?
इजराइल द्वारा लेबनान से कदम पीछे न खींचने के संकल्प के बाद इस क्षेत्र में शांति की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। आने वाले दिनों में यह संभावित परिदृश्य बन सकते हैं:
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लेबनान में जारी रहेगा संघर्ष: इजराइली रक्षा मंत्री इजराइल कात्ज़ ने भी साफ किया है कि सुरक्षा कारणों से सेना लेबनान में जमीनी स्तर पर डटी रहेगी। इसका मतलब है कि हिजबुल्लाह के खिलाफ सैन्य अभियान जारी रह सकता है।
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डील टूटने का खतरा: अगर इजराइल इस समझौते को दरकिनार कर लेबनान या सीधे ईरान पर बड़े हमले जारी रखता है, तो ईरान इस शांति समझौते (Ceasefire Deal) से पीछे हट सकता है, जिससे पूरा क्षेत्र फिर से युद्ध की आग में झुलस सकता है।
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अमेरिका-इजराइल के बीच तनाव: तेल अवीव एयरपोर्ट पर तैनात अमेरिकी सैन्य विमानों (जैसे रीफ्यूलिंग टैंकर) को तुरंत हटाने की इजराइली परिवहन मंत्री की मांग यह दर्शाती है कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक दरार अब सैन्य सहयोग के स्तर तक पहुंच चुकी है।
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