वॉशिंगटन । शुक्रवार, 17 जुलाई 2026
रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच वैश्विक ऊर्जा बाजार और कूटनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया है। अमेरिका में रूसी कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर भारी शिकंजा कसने की तैयारी पूरी हो चुकी है। भारत, चीन, अजरबैजान, स्लोवाकिया और हंगरी जैसे देशों पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क (Tariff) लगाने वाले एक नए संशोधित विधेयक को अमेरिकी सीनेट में जबरदस्त समर्थन मिला है।
इस बिल को अमेरिका के 60 सीनेटरों का द्विदलीय (Bipartisan) समर्थन प्राप्त है, जिससे इसके कानून बनने की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं। खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस कड़े रुख का समर्थन कर चुके हैं। गौरतलब है कि इस बिल को सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने तैयार किया था, जिनका इसी हफ्ते यूक्रेन से लौटने के बाद अचानक निधन हो गया। उनके निधन के बाद अमेरिकी सीनेटर्स के एक समूह ने मंगलवार को इस बिल का संशोधित वर्शन पेश किया है।
क्या है इस अमेरिकी बिल का मुख्य मकसद?
इस कड़े कदम का सीधा उद्देश्य रूस के राजस्व (Revenues) को पूरी तरह से सुखाना है। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि जो देश रूस से तेल खरीद रहे हैं, वे परोक्ष रूप से युद्ध के लिए मॉस्को की फंडिंग कर रहे हैं।
पहले सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने इस बिल में 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का बेहद सख्त प्रस्ताव रखा था। हालांकि, संशोधित विधेयक में इसे व्यावहारिक बनाते हुए अधिकतम 100 प्रतिशत टैरिफ करने का प्रावधान किया गया है। यह बिल विशेष रूप से उन पांच देशों को निशाना बनाता है जो रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं, जिनमें भारत दूसरे नंबर पर आता है।
यूरोपीय देशों को छूट और अमेरिका का ‘दोहरा मापदंड’
इस विधेयक के सामने आते ही वैश्विक राजनीति में एक नई बहस छिड़ गई है, जिसे कई विशेषज्ञ अमेरिका का ‘पाखंड’ और ‘दोहरा मापदंड’ कह रहे हैं। दरअसल, इस बिल में अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों को बड़ी राहत दी गई है:
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प्राकृतिक गैस पर छूट: बिल में एक विशेष खंड रखा गया है, जो यूरोप के उन 15 देशों को छूट देता है जो रूस से अपनी कुल गैस का 15% से कम आयात करते हैं। यानी, रूस से गैस खरीदने वाले यूरोपीय देशों पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा।
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यूरेनियम आयात को छूट: अमेरिका खुद अपने परमाणु ऊर्जा संयंत्रों (Nuclear Power Plants) को चलाने के लिए रूस से भारी मात्रा में यूरेनियम का आयात करता है। अमेरिकी रिफाइनरियों और हितों को सुरक्षित रखने के लिए यूरेनियम को इस बिल के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेटर रिचर्ड ब्लुमेंथल, जो इस बिल के सह-प्रायोजक हैं, उन्होंने साफ तौर पर कहा, “इसमें खास तौर पर निशाना साधकर टैरिफ लगाए गए हैं, जो सिर्फ पांच बड़े खरीदारों तक सीमित हैं। इसमें हमारे यूरोपीय सहयोगियों को निशाना नहीं बनाया गया है।”
प्रस्तावित टैरिफ पर भारत का कड़ा रुख
वॉशिंगटन के इस कदम पर नई दिल्ली ने कड़ा राजनयिक विरोध दर्ज कराया है। भारतीय अधिकारियों ने अमेरिका पर स्पष्ट रूप से ‘दोहरे मापदंड’ अपनाने का आरोप लगाया है।
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ऊर्जा सुरक्षा सर्वोपरि: भारत अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। 2022 में यूक्रेन युद्ध के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूस पर पाबंदियां लगाई थीं, तब भारत ने घरेलू महंगाई को नियंत्रित करने और अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदना शुरू किया था।
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व्यापार वार्ता पर खतरा: भारतीय अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अमेरिका का यह एकतरफा कदम दोनों देशों के बीच चल रही द्विपक्षीय व्यापार वार्ता को खटाई में डाल सकता है।
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रिफाइनिंग में बड़ा निवेश: रूसी तेल को प्रोसेस करने के लिए भारतीय रिफाइनिंग कंपनियों ने अपनी मशीनों में करोड़ों का निवेश कर बदलाव किए हैं। वर्तमान में रूस भले ही प्रीमियम कीमतों पर तेल बेच रहा हो, लेकिन इन बदलावों के कारण भारतीय कंपनियों के लिए यह अभी भी किफायती साबित हो रहा है।
आगे क्या होगा?
यह विधेयक अभी केवल अमेरिकी सीनेट में संशोधित रूप में पेश किया गया है। इसे कानून बनने के लिए अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (प्रतिनिधि सभा) दोनों से पूर्ण बहुमत से पारित होना होगा, जिसके बाद इस पर अमेरिकी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होंगे। भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) बनाए रखने के लिए लगातार इस कूटनीतिक दबाव का विरोध कर रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. अमेरिका रूसी तेल खरीदारों पर कितने प्रतिशत टैरिफ लगाने की तैयारी में है?
संशोधित विधेयक के अनुसार, रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक का दंडात्मक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है।
Q2. इस बिल में किन प्रमुख देशों को निशाना बनाया गया है?
इस बिल में मुख्य रूप से पांच देशों का नाम शामिल है – भारत, चीन, अजरबैजान, स्लोवाकिया और हंगरी।
Q3. भारत इस अमेरिकी बिल का विरोध क्यों कर रहा है?
भारत का मानना है कि अमेरिका यूरोपीय देशों और खुद के यूरेनियम आयात को छूट देकर दोहरा मापदंड अपना रहा है, जबकि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को निशाना बनाया जा रहा है।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख उपलब्ध स्रोतों और अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए प्रस्ताव के विवरणों पर आधारित है। यह बिल अभी एक विधायी प्रक्रिया (Legislative Process) के अधीन है और इसके अंतिम कानून बनने तक प्रावधानों में बदलाव संभव है।
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