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मोदी के बाद की बीजेपी!

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– डॉ. अतुल मलिकराम

भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर को यदि मोदी युग कहा जाए, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले एक दशक में न केवल देश की सत्ता संभाली, बल्कि राजनीति के व्याकरण को ही बदल दिया। गुजरात के वडनगर की साधारण गलियों से निकलकर विश्व पटल पर छा जाने वाले मोदी का सफर संघर्ष और दूरदर्शिता की एक अनूठी कहानी है। लेकिन साल 2026 में खड़े होकर जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, तो एक बड़ा सवाल राजनीतिक गलियारों में गूँजता दिखाई देता है कि आखिर मोदी के बाद बीजेपी का क्या होगा? क्या यह पार्टी अपने इस सबसे बड़े चेहरे के बिना भी उसी मजबूती से खड़ी रह पाएगी? यह प्रश्न केवल राजनीतिक विश्लेषकों के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है जो भारतीय लोकतंत्र की बदलती दिशा को समझना चाहता है।

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता सिर्फ चुनावी आंकड़ों या नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनता के सीधे जुड़ाव और उनके भरोसे पर टिकी है। मोदी ने एक संगठन कार्यकर्ता के रूप में जमीन पर रहकर उन समस्याओं को महसूस किया है, जो एक आम आदमी रोज झेलता है। यही कारण है कि उनकी नीतियां किताबी होने के बजाय व्यावहारिक नजर आती हैं। 2014 में जब उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, तब देश में निराशा का माहौल था। जैसा कि बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने हाल ही में गांधीनगर की एक समिट में जिक्र किया था कि 2012-13 के दौरान युवा और व्यापार जगत दोनों ही भविष्य को लेकर असुरक्षित थे। मोदी ने स्टार्टअप इंडिया और स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों के जरिए इस माहौल को बदला। उन्होंने 140 करोड़ देशवासियों को देश की सबसे बड़ी संपत्ति मानकर ‘सबका साथ, सबका विकास’ का मंत्र दिया, जिसका असर आज देश के बुनियादी ढांचे और डिजिटल अर्थव्यवस्था में साफ दिखाई देता है।

तथ्यों की बात करें, तो मोदी के नेतृत्व में भारत ने ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस और वाइब्रेंट गुजरात जैसे मॉडलों को पूरे देश में लागू किया। आज भारत केवल घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे वैश्विक मंचों पर भी अपनी भूमिका तय कर रहा है। ग्रामीण भारत से लेकर मुंबई और पुणे जैसे महानगरों तक, बीजेपी की चुनावी जीत मोदी के प्रति लोगों के अटूट विश्वास का प्रमाण है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी की सफलता यह साबित करती है कि मोदी का प्रभाव केवल हिंदी भाषी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के हर कोने में मतदाता उनके विकास कार्यों पर मुहर लगा रहा है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी भी इसी बात को दोहराते हैं कि यह जीत मोदी के प्रति बढ़ती स्वीकार्यता का ही नतीजा है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या बीजेपी केवल मोदी के सहारे चलने वाली पार्टी है? इस सवाल का जवाब पार्टी के भीतर छिपी उसकी संगठनात्मक गहराई में मिलता है। बीजेपी की सबसे बड़ी खूबी उसका वह मजबूत ढांचा है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की विरासत पर टिका है। आरएसएस का विशाल कार्यकर्ता नेटवर्क बीजेपी को वह जमीनी ताकत देता है, जो शायद ही दुनिया के किसी अन्य दल के पास हो। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के रूप में जो क्षेत्रीय समन्वय बैठकें चल रही हैं, वे इसी ताकत का सबूत हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में होने वाली ये बैठकें यह सुनिश्चित कर रही हैं कि सरकार, संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच कोई दूरी न रहे। अवध से लेकर गोरखपुर और पश्चिम यूपी तक फैला यह नेटवर्क ही पार्टी की असली रीढ़ है।

बीजेपी ने समय की मांग को समझते हुए भविष्य के नेतृत्व पर भी काम शुरू कर दिया है। 45 वर्षीय नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी अब युवा ऊर्जा के साथ आगे बढ़ना चाहती है। इसे बीजेपी में एक नए युग की शुरुआत माना जा रहा है, जो ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को लेकर गंभीर है। सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राज्यों में भी योगी आदित्यनाथ, हिमंत बिस्वा सरमा और देवेंद्र फडणवीस जैसे मजबूत चेहरे तैयार किए गए हैं। यह तथ्य कि बीजेपी वर्तमान में 21 राज्यों में सत्ता में है, यह दर्शाता है कि पार्टी के पास नेतृत्व की एक लंबी और प्रभावशाली कतार है, जो केवल एक व्यक्ति पर केंद्रित नहीं है।

बेशक, मोदी के सक्रिय राजनीति से हटने पर बीजेपी के सामने कुछ चुनौतियां जरूर आएंगी। एक करिश्माई नेता की कमी हमेशा खलती है और कुछ वोट ऐसे जरूर होते हैं जो केवल मोदी के नाम पर पार्टी से जुड़ते हैं। विपक्षी दल भी इस खालीपन का फायदा उठाने की कोशिश करेंगे। हालांकि, पार्टी की विचारधारा राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और अंत्योदय, ऐसी जड़ें हैं जो नेतृत्व परिवर्तन के दौरान भी संगठन को बांधे रखती हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी का वोट शेयर स्थिर है, जिसका मतलब है कि जनता केवल चेहरे को नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यशैली और विचारधारा को भी समर्थन दे रही है।

कुल मिलाकर देखें तो नरेंद्र मोदी के बिना बीजेपी का भविष्य अंधकारमय नहीं है। मोदी ने पार्टी को जिस ऊंचाई पर पहुंचाया है, वहां से आगे जाने के लिए संगठन के पास एक स्पष्ट रोडमैप और मजबूत कार्यकर्ता शक्ति है। यूपी में तीन-स्तरीय समन्वय रणनीति और युवा नेतृत्व को दी जा रही तवज्जो इस बात का प्रमाण है कि पार्टी भविष्य के लिए पूरी तरह तैयार है। नेतृत्व का रूप बदल सकता है, लेकिन बीजेपी की वैचारिक दिशा और विकास का संकल्प वही रहने वाला है। जैसा कि कई राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं, बीजेपी के भीतर अब हजारों मोदी तैयार हो चुके हैं, जो उनके द्वारा शुरू किए गए कार्यों को आगे ले जाने में सक्षम हैं। यही संगठनात्मक जीवंतता बीजेपी को मोदी के बाद भी भारतीय राजनीति का केंद्र बनाए रखेगी।

लेखक राजनीतिक रणनीतिकार है.

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