मुंबई । रविवार, 19 जुलाई 2026
संसद के मानसून सत्र (जो 20 जुलाई 2026 से शुरू हो रहा है) से ठीक दो दिन पहले देश की राजनीति में एक बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने शनिवार, 18 जुलाई 2026 को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के 6 बागी सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को औपचारिक रूप से मंजूरी दे दी है।
इस फैसले के बाद लोकसभा सचिवालय ने सदन में पार्टियों की स्थिति की संशोधित सूची जारी कर दी है। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस फैसले के क्या मायने हैं, संसद का गणित कैसे बदला और इसका महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।
शिंदे गुट की बढ़ी संसदीय ताकत, उद्धव को लगा तगड़ा झटका
इस आधिकारिक विलय के बाद निचले सदन (लोकसभा) में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के सांसदों की संख्या 7 से बढ़कर अब 13 हो गई है। वहीं दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे के गुट के पास अब लोकसभा में केवल 3 सांसद ही बचे हैं। इस फैसले से न केवल शिंदे गुट को राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी पहचान मिली है, बल्कि केंद्र की सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को भी सदन में अतिरिक्त मजबूती मिली है।
नोट: इसी फैसले के साथ लोकसभा अध्यक्ष ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भी 20 बागी सांसदों को संसद में मूल पार्टी से अलग बैठने की अनुमति दी है, जिससे विपक्षी खेमे (INDIA Alliance) को दोहरा झटका लगा है।
क्या कहता है दलबदल विरोधी कानून और 2/3 का गणित?
उद्धव ठाकरे गुट (Shiv Sena UBT) ने इस बगावत के बाद तुरंत लोकसभा अध्यक्ष से मिलकर इन सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि मूल राजनीतिक दल की अनुमति के बिना सिर्फ विधायी दल का विलय संवैधानिक रूप से मान्य नहीं है।
हालाँकि, कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों से लंबी चर्चा के बाद लोकसभा अध्यक्ष ने इस तर्क को स्वीकार किया कि चूंकि उद्धव गुट के कुल 9 सांसदों में से 6 सांसद (यानी स्पष्ट दो-तिहाई बहुमत) अलग हुए हैं, इसलिए संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत इन पर अयोग्यता लागू नहीं होती।
शामिल होने वाले ‘कट्टर शिवसैनिक’ सांसद कौन हैं?
इस विलय प्रक्रिया के तहत पाला बदलने वाले सांसदों में प्रमुख रूप से शामिल हैं:
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संजय हरिभाऊ जाधव
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भाऊसाहेब राजाराम वाकचौरे
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ओमप्रकाश भूपालसिंह निंबालकर
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संजय दीना पाटिल
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संजय उत्तमराव देशमुख
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नागेश बापुराव पाटिल आष्टीकर
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह बालासाहेब ठाकरे के मूल विचारों की जीत है और यह कदम पूरी तरह से पारदर्शी और कानूनी प्रक्रियाओं के तहत उठाया गया था।
महाराष्ट्र की राजनीति और आगामी चुनावों पर असर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस फैसले का सबसे बड़ा असर आगामी महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों पर देखने को मिलेगा।
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संगठन पर संकट: उद्धव ठाकरे के सामने अब अपने बचे हुए संगठन, कैडर और जनाधार को एकजुट रखने की बड़ी चुनौती होगी।
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कानूनी लड़ाई का अगला चरण: यह तय माना जा रहा है कि उद्धव ठाकरे गुट इस फैसले के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) का रुख कर सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह कानूनी लड़ाई एक नया मोड़ ले सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: दलबदल विरोधी कानून के तहत 2/3 नियम क्या है?
उत्तर: भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार, यदि किसी राजनीतिक दल के निर्वाचित सदस्यों (सांसदों या विधायकों) में से कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य अलग होकर किसी अन्य दल में शामिल होते हैं या नया दल बनाते हैं, तो उनकी सदन की सदस्यता रद्द नहीं होती।
प्रश्न 2: इस फैसले के बाद लोकसभा में शिवसेना (शिंदे गुट) के कितने सांसद हो गए हैं?
उत्तर: 6 नए सांसदों के विलय के बाद अब लोकसभा में शिंदे गुट के कुल सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है।
प्रश्न 3: क्या उद्धव ठाकरे गुट इस फैसले को चुनौती दे सकता है?
उत्तर: हाँ, लोकसभा अध्यक्ष के इस फैसले के खिलाफ उद्धव ठाकरे गुट के पास सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के लिए याचिका दायर करने का पूरा अधिकार है।
अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रमों, आधिकारिक लोकसभा सचिवालय की अधिसूचनाओं और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। किसी भी कानूनी कार्यवाही या अंतिम न्यायिक निर्णयों के लिए कृपया संबंधित आधिकारिक स्रोतों का संदर्भ लें।
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