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स्वाधीनता के अमृत काल में ‘स्व’ को जगाने की आवश्यकता है – जे. नंदकुमार जी

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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जयपुर। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के अंतिम दिन चारबाग में पुस्तक परिचर्चा सत्र में प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार जी की पुस्तक ‘नेशनल सेल्फहुड इन साइंस’ पर चर्चा हुई। पुस्तक की विषयवस्तु को विस्तार देते हुए जे. नंदकुमार जी ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम में समाज जीवन के विविध क्षेत्रों ने अपनी-अपनी भूमिका का निर्वाह किया। यह संग्राम केवल राजनैतिक नहीं था, अपितु इसमें विज्ञान, कला, साहित्य, पत्रकारिता और समाज के हर क्षेत्र की सक्रिय भूमिका रही थी। प्राचीन ऐतिहासिक या उपनिषद् कालीन विज्ञान की स्थिति को छोड़ भी दें तो भी अंग्रेजों के शासनकाल में भी जगदीश चंद्र बोस, रघुनाथ साहा जैसे अनेक वैज्ञानिकों ने अपने-अपने क्षेत्र में वैश्विक स्तर के अनुसंधान किये। खगोल विज्ञान, गणित, भौतिकी, रसायन, चिकित्सा एवं कृषि के क्षेत्र में जो भारत के विशेष अवदान हुए, उनको अंग्रेजों एवं गुलाम मानसिकता के भारतीयों ने भी उस रूप में स्वीकार नहीं किया, उसके विपरीत यह स्थापित करने का षड्यंत्र किया गया कि यहां जो कुछ भी अनुसंधान हुआ है, वह अंधविश्वास है, फेक है, अवैज्ञानिक है। जबकि वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है।

भारतीय मनीषा द्वारा की गई खोज सदा से मानव कल्याण के लिए सिद्ध होती रही है, बहुत अधिक पीछे नहीं भी जाएं तो अभी कोरोना काल में भी भारत द्वारा विकसित की गई वैक्सीन लगभग 100 देशों में नि:शुल्क भेजी गई। विज्ञान के क्षेत्र में जो भी अनुसंधान हुए, उन सब के पीछे भी सर्व कल्याण की भावना थी और जो वैक्सीन को पहुंचाने वाले हवाई जहाज थे, उन पर भी स्लोगन दिया गया था – सर्वे संतु निरामया:, यही भारत का स्वत्त्व है।

स्वाधीनता के पश्चात भी स्व के तंत्र का जो विकास होना चाहिए था, 75 वर्ष में वह शेष रह गया। आने वाली पीढ़ी को इस बात का अनुभव कराया जाना बहुत आवश्यक है कि भारतीय विज्ञान में स्व के तत्व के साथ विश्व कल्याण की भावना निहित है जो संसार में कहीं अन्यत्र देखने को नहीं मिलती। स्वाधीनता के अमृत काल में इसी स्व को जगाने की आवश्यकता है।

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साभार : विश्व संवाद केंद्र

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।