मुंबई. वर्ष 2026 में भारत की अध्यक्षता में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होने जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने ब्रिक्स देशों की सेंट्रल बैंक डिजिटल मुद्राओं (CBDCs) को आपस में जोड़ने का एक क्रांतिकारी प्रस्ताव दिया है। यह कदम न केवल अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली को सरल बनाएगा, बल्कि दशकों से चले आ रहे अमेरिकी डॉलर के एकाधिकार को भी सीधी चुनौती देगा।
1. डिजिटल करेंसी इंटरऑपरेबिलिटी: क्या है यह तकनीक?
RBI का मुख्य सुझाव यह है कि ब्रिक्स देशों को एक ऐसा साझा डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करना चाहिए जहाँ प्रत्येक देश की डिजिटल मुद्रा (जैसे भारत का e-Rupee और चीन का e-CNY) एक-दूसरे के साथ सीधे संवाद कर सकें।
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बिना मध्यस्थ के व्यापार: वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय लेनदेन के लिए डॉलर को एक ‘ब्रिज करेंसी’ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। साझा CBDC नेटवर्क इस मध्यस्थता को खत्म कर देगा।
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ब्रिक्स ब्रिज (BRICS Bridge): यह एक ऐसी तकनीकी प्रणाली होगी जो विभिन्न देशों के लेजर (Ledgers) को जोड़ती है, जिससे पैसा सेकंडों में एक देश से दूसरे देश पहुँच जाएगा।
2. डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में ‘क्रांतिकारी’ कदम
इस प्रस्ताव को “डी-डॉलरलाइजेशन” (Dedollarization) की दिशा में सबसे प्रभावी हथियार माना जा रहा है। इसके क्रांतिकारी होने के तीन मुख्य कारण हैं:
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SWIFT का विकल्प: वर्तमान वित्तीय प्रणाली SWIFT नेटवर्क पर निर्भर है, जिस पर पश्चिमी देशों का नियंत्रण है। डिजिटल करेंसी का अपना स्वतंत्र नेटवर्क होने से ब्रिक्स देश किसी भी बाहरी प्रतिबंध (Sanctions) से सुरक्षित रहेंगे।
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विनिमय दर का जोखिम कम होना: डॉलर की कीमत में उतार-चढ़ाव अक्सर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर देता है। स्थानीय डिजिटल मुद्राओं में सीधा व्यापार इस जोखिम को समाप्त करता है।
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लेनदेन की लागत में 80% तक की कमी: डॉलर आधारित लेनदेन में कई बैंक और मध्यस्थ शामिल होते हैं। साझा CBDC ढांचे से यह लागत लगभग शून्य हो जाएगी।
3. भारत की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
भारत के लिए यह प्रस्ताव केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी अत्यधिक लाभकारी है:
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रुपये का वैश्विक विस्तार: यदि ब्रिक्स देश व्यापार के लिए ‘ई-रुपी’ को स्वीकार करते हैं, तो भारतीय रुपया एक अंतरराष्ट्रीय आरक्षित मुद्रा (Reserve Currency) बनने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
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निर्यातकों को लाभ: भारतीय निर्यातक (Exporters) सीधे अपनी मुद्रा में भुगतान प्राप्त कर सकेंगे, जिससे उनका लाभ मार्जिन बढ़ेगा।
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ऊर्जा सुरक्षा: रूस और UAE जैसे देशों से कच्चे तेल का आयात डिजिटल मुद्राओं में होने से भारत का डॉलर पर खर्च कम होगा, जिससे चालू खाता घाटा (CAD) कम करने में मदद मिलेगी।
4. ब्रिक्स प्लस (BRICS+) और ऊर्जा कूटनीति
नए सदस्यों (UAE, ईरान, मिस्र, इथियोपिया) के आने से इस प्रस्ताव की ताकत कई गुना बढ़ गई है:
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पेट्रो-डिजिटल युग: दुनिया के बड़े तेल और गैस उत्पादक देश अब ब्रिक्स का हिस्सा हैं। यदि वैश्विक ऊर्जा व्यापार का एक छोटा हिस्सा भी डॉलर के बजाय इस डिजिटल नेटवर्क पर स्थानांतरित होता है, तो डॉलर की वैश्विक मांग में भारी गिरावट आएगी।
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ईरान और रूस का एकीकरण: इन देशों के लिए यह प्रस्ताव एक “लाइफलाइन” की तरह है, जो उन्हें वैश्विक अर्थव्यवस्था से सीधे जोड़ देगा।
5. चुनौतियाँ और तकनीकी बाधाएं
यद्यपि यह प्रस्ताव आकर्षक है, लेकिन इसके कार्यान्वयन में कुछ बड़ी चुनौतियां हैं:
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प्रौद्योगिकी सामंजस्य: क्या सभी देशों के डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर एक-दूसरे के अनुकूल हैं?
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डेटा गोपनीयता: क्या सदस्य देश एक-दूसरे के साथ लेनदेन का डेटा साझा करने में सहज होंगे?
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नियामक ढांचा: एक साझा नियम पुस्तिका (Rulebook) बनाना, जो सभी देशों के केंद्रीय बैंकों को मान्य हो।
आरबीआई का यह प्रस्ताव वैश्विक वित्त के लोकतांत्रिकीकरण की दिशा में एक साहसिक प्रयास है। यह न केवल भारत की तकनीकी शक्ति (UPI और e-Rupee) का प्रदर्शन करता है, बल्कि एक “बहुध्रुवीय विश्व” (Multipolar World) के सपने को भी साकार करता है। यदि 2026 के अंत तक इस पर ठोस नीति बनती है, तो यह 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (जिसने डॉलर को वैश्विक राजा बनाया था) के बाद का सबसे बड़ा वित्तीय बदलाव होगा।
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