विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें दुनिया ‘वीर सावरकर’ के नाम से जानती है, केवल एक क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि एक महान दूरदर्शी और विचारक भी थे। उनके विचारों के केंद्र में एक ही संकल्प था—अखंड भारत। उनके लिए भारत केवल भूमि का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इकाई थी।
सावरकर का ‘अखंड भारत’ का स्वप्न आज भी करोड़ों भारतीयों के लिए राष्ट्रवाद की एक प्रेरणादायक मशाल है। आइए, उनके इस महान विचार की गहराई को समझें।
1. सांस्कृतिक और भौगोलिक एकता का विचार
सावरकर का मानना था कि भारत की सीमाएं प्रकृति द्वारा निर्धारित की गई हैं। हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक और सिंधु नदी से लेकर ब्रह्मपुत्र तक फैला यह भूभाग सदियों से एक ही संस्कृति और इतिहास से जुड़ा रहा है।
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पुण्यभूमि और पितृभूमि: सावरकर ने ‘हिंदू’ की परिभाषा देते हुए कहा था कि वह हर व्यक्ति हिंदू है, जिसके लिए यह भारतवर्ष उसकी ‘पितृभूमि’ (पूर्वजों की भूमि) और ‘पुण्यभूमि’ (पवित्र भूमि) है।
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अविभाज्य भारत: उनका स्पष्ट मत था कि राजनीतिक कारणों से खींची गई सीमाएं भारत की आत्मा को विभाजित नहीं कर सकतीं।
2. विभाजन का विरोध और राष्ट्र की अखंडता
सावरकर उन गिने-चुने नेताओं में से थे जिन्होंने भारत के विभाजन की संभावना का सबसे मुखर विरोध किया। उन्होंने चेतावनी दी थी कि धर्म के आधार पर राष्ट्र का बंटवारा न केवल भौगोलिक क्षति होगी, बल्कि यह भविष्य के लिए निरंतर संघर्ष का बीज बोएगा।
उनका विचार था कि “स्वतंत्रता अधूरी है यदि वह अखंडता की कीमत पर मिले।” वे चाहते थे कि भारत एक ऐसा सशक्त राष्ट्र बने जहां धर्म, जाति और पंथ से ऊपर उठकर ‘राष्ट्रीयता’ सर्वोपरि हो।
3. ‘अखंड भारत’ के स्वप्न के स्तंभ
सावरकर के अखंड भारत की परिकल्पना केवल सीमाओं के विस्तार तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें गहरे वैचारिक स्तंभ शामिल थे:
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शक्तिशाली सैन्य बल: सावरकर का नारा था, “राजनीति का हिंदूकरण और हिंदुओं का सैन्यीकरण।” उनका मानना था कि एक अखंड और सुरक्षित राष्ट्र के लिए उसकी सीमाओं की रक्षा करने वाला बल अत्यधिक शक्तिशाली होना चाहिए।
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सामाजिक समरसता: सावरकर ने छुआछूत और जातिवाद जैसी कुरीतियों का कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि जब तक समाज अंदर से एकजुट नहीं होगा, राष्ट्र ‘अखंड’ नहीं रह सकता।
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सांस्कृतिक गौरव: उन्होंने सदैव भारतीय इतिहास के स्वर्णिम काल की याद दिलाई ताकि युवा पीढ़ी हीन भावना त्याग कर राष्ट्र निर्माण में जुटे।
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4. आज के संदर्भ में सावरकर का स्वप्न
आज जब हम ‘अखंड भारत’ की बात करते हैं, तो इसका अर्थ केवल सीमाओं को फिर से जोड़ना नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक एकता है।
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राष्ट्रीय सुरक्षा: सावरकर के विचार हमें सीमाओं की सुरक्षा के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देते हैं।
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आत्मनिर्भरता: एक अखंड और सशक्त भारत का अर्थ है आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर (Atmanirbhar) राष्ट्र।
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एकता का सूत्र: यह स्वप्न हमें याद दिलाता है कि विविधताओं के बावजूद हम सब एक ही महान विरासत के उत्तराधिकारी हैं।
“भारत केवल एक राष्ट्र नहीं है, यह एक विचार है, एक सत्य है, और एक अनंत यात्रा है।”
वीर सावरकर का ‘अखंड भारत’ का स्वप्न हमें कायरता त्यागने और पुरुषार्थ को अपनाने की प्रेरणा देता है। यह स्वप्न हमें सिखाता है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए समर्पण ही एक सच्चे नागरिक का सबसे बड़ा धर्म है। सावरकर के विचार आज भी हमें एक ऐसे भारत की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं जो आत्मविश्वास से भरा हो, शक्तिशाली हो और पूरे विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो।
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