झांसी । रविवार, 21 जून 2026
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) खण्ड बार के प्रारंभिक वर्ग के शिक्षार्थियों के लिए आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में भारतीय जीवन दर्शन और राष्ट्रीय एकता के मूल मंत्रों को रेखांकित किया गया। इस वर्ग के समापन सत्र को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के झांसी विभाग के विभाग प्रचार प्रमुख मनोज टाटा ने शिक्षार्थियों के सामने भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक वृहद चित्र प्रस्तुत किया।
मनोज टाटा ने कहा कि भारतीय संस्कृति में विविधता में एकता केवल एक चुनावी या पोस्टर का नारा नहीं है, बल्कि यह सदियों से हमारे समाज का व्यावहारिक सच रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भौगोलिक और भाषाई विभिन्नताओं के बाद भी संपूर्ण देश एक सूत्र में पिरोया हुआ है।
भाषा, वेश और भोजन अलग, पर धड़कता है एक ही दिल
अपने ओजस्वी बौद्धिक संबोधन में विभाग प्रचार प्रमुख ने कहा, “हमारे देश में 1600 से अधिक बोलियां बोली जाती हैं। हर राज्य का खान-पान अलग है, पहनावा अलग है, लेकिन जब हम एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं, तो पूरे देश में ‘नमस्ते’ का एक ही स्वर गूंजता है।” उन्होंने आगे कहा कि भारत की यही ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (पूरी दुनिया को एक परिवार मानने वाली) सोच ही इसे विश्व गुरु बनाती है। यहाँ की धरती पर इतिहास के हर कालखंड में सभी पंथों और धर्मों को सम्मानजनक स्थान मिला है।
जीवन का वास्तविक लक्ष्य: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
आधुनिक जीवनशैली में केवल भौतिकता की अंधी दौड़ पर चिंता व्यक्त करते हुए मनोज जी ने शिक्षार्थियों को याद दिलाया कि भारतीय संस्कृति में जीवन का अंतिम लक्ष्य सिर्फ पैसा कमाना कभी नहीं रहा। हमारे मनीषियों ने जीवन के चार पुरुषार्थ तय किए हैं—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।
उन्होंने जोर देकर कहा कि पूजा-पद्धति, योग और ध्यान हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न अंग हैं। भारतीय घरों से लेकर भव्य मंदिरों तक, आध्यात्मिकता हमारी रग-रग में बसी है। इसके साथ ही, “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव” का संस्कार, संयुक्त परिवार की व्यवस्था, बुजुर्गों का आदर और गुरु को ईश्वर से भी ऊपर का दर्जा देना ही हमारे समाज की मुख्य रीढ़ (Backbone) है।
पर्यावरण और प्रकृति की पूजा हैं हमारे संस्कार
संघ के इस वर्ग में पर्यावरण चेतना पर भी विशेष जोर दिया गया। वक्ता ने कहा कि हम प्रकृति का शोषण नहीं, बल्कि पोषण करने वाली संस्कृति के संवाहक हैं। हम नदियों को केवल जल का स्रोत नहीं मानते, बल्कि उन्हें ‘मां गंगा’ कहकर पूजते हैं। गाय, पेड़-पौधे और सूर्य की पूजा करना हमारी प्रकृति-अनुकूल जीवनशैली का प्रमाण है। दीवाली जैसे प्रमुख त्योहारों पर केवल दीप जलाना ही नहीं, बल्कि नए पौधे लगाना भी इसी गौरवशाली परंपरा का हिस्सा है।
कला और संस्कृति के विविध आयामों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भरतनाट्यम से लेकर भांगड़ा तक, और ताजमहल की वास्तुकला से लेकर अजंता-एलोरा की गुफाओं और बनारसी साड़ी से लेकर मधुबनी पेंटिंग तक—हर राज्य का शिल्प और हुनर बेजोड़ है। भारत में मनाए जाने वाले ’12 महीने और 13 त्योहार’ (जैसे होली और दीवाली) केवल पूजा-पाठ के अवसर नहीं हैं, बल्कि ये समाज के हर वर्ग को आपसी भाईचारे के एक रंग में रंगने और जोड़ने का जरिया हैं।
संघ की शाखाओं से समाज को जोड़ने का संकल्प
शिक्षार्थियों को संघ कार्य की महत्ता समझाते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इन प्राथमिक और प्रारंभिक वर्गों में आने से युवाओं को न केवल शारीरिक सामर्थ्य मिलता है, बल्कि उनकी बौद्धिक क्षमता का भी विकास होता है। इस वर्ग से ट्रेनिंग लेकर वापस जाने के बाद सभी शिक्षार्थियों का मुख्य दायित्व अपने-अपने क्षेत्रों में संघ की शाखाओं के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का होना चाहिए।
अनुशासित व्यवस्था में संपन्न हुआ वर्ग
खण्ड बार का यह प्रारंभिक वर्ग पूरी तरह अनुशासित और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न हुआ। इस सफल आयोजन में व्यवस्था टोली के पदाधिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें मुख्य रूप से शामिल रहे:
-
वर्गव्यवस्था प्रमुख: आकाश चतुर्वेदी
-
खण्ड संघचालक: अवधेश गोस्वामी
-
प्रबंधन सहयोगी: जगदीश, अभिनव, नीलेश, विजय, आदेश, पुरुषोत्तम, गिरवल, नमन, रवि और डॉ. आदिल दुबे।
इस सात दिवसीय या प्राथमिक श्रेणी के वर्ग में कुल 31 शिक्षार्थियों ने पूर्ण निष्ठा और अनुशासन के साथ अपनी सहभागिता दर्ज कराई और राष्ट्र सेवा का संकल्प लिया।
Matribhumisamachar


