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संपादकीय: आस्था पर आघात और जागता सनातन – क्या अब केवल ‘मौन’ रहना विकल्प नहीं?

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हैदराबाद के मंदिर में तोड़फोड़ के बाद प्रदर्शन करता हिंदू समाज

हैदराबाद से लेकर देश के सुदूर कोनों तक, मंदिरों पर होते हमले और उसके प्रत्युत्तर में शुरू हुआ ‘घर वापसी’ का अभियान केवल धार्मिक घटनाक्रम नहीं हैं। यह आधुनिक भारत में एक गहरी सांस्कृतिक चेतना के पुनरुत्थान और अपनी जड़ों की रक्षा के संकल्प का प्रतीक है।

आस्था के केंद्रों पर क्यों है निशाना?

हाल ही में हैदराबाद के पुरानापुल में मैसम्मा मंदिर में हुई तोड़फोड़ की घटना ने एक बार फिर उस कड़वी सच्चाई को सामने रखा है, जिसे अक्सर ‘शांति’ और ‘सौहार्द’ के नाम पर ढंक दिया जाता है। जब किसी समाज के आस्था के केंद्रों (मंदिरों) को खंडित किया जाता है, तो वह केवल पत्थर की मूर्ति पर प्रहार नहीं होता, बल्कि उस समाज के आत्मसम्मान और धैर्य की परीक्षा होती है।

प्रशासन इसे ‘असामाजिक तत्वों’ या ‘मानसिक विक्षिप्तों’ की करतूत कहकर पल्ला झाड़ लेता है, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी ‘विक्षिप्तता’ का निशाना हमेशा एक ही पक्ष के धार्मिक स्थल क्यों बनते हैं?

‘घर वापसी’: जड़ों की ओर लौटने का मार्ग

एक ओर जहां आस्था पर प्रहार हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ‘घर वापसी’ के माध्यम से समाज अपनी खोई हुई ऊर्जा को बटोर रहा है। मध्य प्रदेश के मंडला से लेकर झारखंड के जंगलों तक, ईसाई या अन्य धर्म अपना चुके परिवारों का पुनः वैदिक रीति से सनातन में लौटना इस बात का प्रमाण है कि ‘जड़ें कभी नहीं सूखतीं’

यह आंदोलन धर्मांतरण की उन साजिशों का जवाब है, जो दशकों से प्रलोभन और भ्रम के आधार पर चलाई जा रही थीं। घर वापसी अब केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक शुद्धि यज्ञ बन चुका है, जो यह संदेश देता है कि सनातन धर्म अपनी खोई हुई संतान को गले लगाने के लिए सदैव तत्पर है।

जागरूकता ही सुरक्षा का कवच है

हैदराबाद की सड़कों पर उतरा आक्रोश यह बताता है कि अब हिंदू समाज केवल ‘सहने’ के लिए तैयार नहीं है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण संतुलन की आवश्यकता है:

  1. कानूनी सक्रियता: आक्रोश को सड़क पर हिंसा के बजाय ‘लीगल सेल’ और संवैधानिक माध्यमों से व्यक्त करना अधिक प्रभावी है।

  2. संगठित समाज: मंदिरों की सुरक्षा केवल पुलिस के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती; स्थानीय स्तर पर ‘मंदिर रक्षक समितियों’ का गठन अनिवार्य हो गया है।

  3. युवाओं की भूमिका: सोशल मीडिया का उपयोग अफवाह फैलाने के बजाय तथ्यों को उजागर करने और अपनी विरासत के गौरव को साझा करने के लिए होना चाहिए।

सनातन धर्म का इतिहास गवाह है कि यह धर्म कभी ‘आक्रामक’ नहीं रहा, लेकिन ‘आत्मरक्षा’ इसका नैसर्गिक अधिकार है। हैदराबाद की घटनाएं एक चेतावनी हैं, और घर वापसी की लहर एक उम्मीद। यदि हमें अपनी भावी पीढ़ी को एक सुरक्षित सांस्कृतिक वातावरण देना है, तो आज की पीढ़ी को सजग, सशक्त और संगठित होना ही होगा।मौन रहना अब शांति का प्रतीक नहीं, बल्कि कमजोरी का संकेत माना जा सकता है। अब समय है कि हम अपनी धरोहरों के प्रहरी बनें और अपनी जड़ों की रक्षा के लिए अडिग खड़े रहें।

– सारांश कनौजिया, संपादक, मातृभूमि समाचार

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