नई दिल्ली. भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभों में से एक, न्यायपालिका, इन दिनों अपने भीतर से उठ रही आवाजों के कारण चर्चा में है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ न्यायाधीश द्वारा कॉलेजियम सिस्टम (Collegium System) और जजों के तबादले (Transfer) की प्रक्रिया पर उठाए गए सवालों ने एक नई संवैधानिक बहस को जन्म दे दिया है।
1. क्या है ताजा विवाद?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम/पीठ के दौरान जजों की नियुक्ति और तबादले की मौजूदा व्यवस्था पर कुछ गंभीर टिप्पणियाँ कीं:
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गोपनीयता पर सवाल: जजों के चयन की प्रक्रिया इतनी गुप्त क्यों है कि आम जनता या यहाँ तक कि अन्य जजों को भी इसके मापदंड पता नहीं होते?
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तबादले का आधार: जजों के तबादले के पीछे ‘प्रशासनिक कारणों’ का हवाला दिया जाता है, लेकिन अक्सर इसे ‘दंड’ (Punishment) के रूप में देखा जाता है। न्यायाधीश ने मांग की कि तबादले के पीछे के ठोस कारणों को सार्वजनिक या कम से कम रिकॉर्ड पर स्पष्ट किया जाना चाहिए।
2. कॉलेजियम सिस्टम: पक्ष और विपक्ष
भारत में जजों की नियुक्ति की व्यवस्था ‘कॉलेजियम’ के हाथ में है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के चार सबसे वरिष्ठ जज शामिल होते हैं।
| पक्ष (तर्क) | विपक्ष (आलोचना) |
| न्यायिक स्वतंत्रता: यह कार्यपालिका (सरकार) के हस्तक्षेप को रोकता है। | अपारदर्शिता: इसे “जजों द्वारा जजों की नियुक्ति” कहा जाता है, जिसमें पारदर्शिता की कमी है। |
| विशेषज्ञता: केवल जज ही बेहतर समझ सकते हैं कि न्यायाधीश बनने के लिए कौन योग्य है। | भाई-भतीजावाद: इसमें भाई-भतीजावाद और ‘पसंदीदा’ जजों को आगे बढ़ाने के आरोप लगते हैं। |
| संवैधानिक मर्यादा: यह शक्ति के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत की रक्षा करता है। | जवाबदेही का अभाव: चयन प्रक्रिया का कोई लिखित मापदंड या सार्वजनिक डेटाबेस नहीं है। |
3. जजों के तबादले का पेच
हाई कोर्ट के जजों का एक राज्य से दूसरे राज्य में तबादला अक्सर विवादों में रहता है। आलोचकों का मानना है कि:
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कई बार स्वतंत्र निर्णय लेने वाले जजों का तबादला कर उन्हें हतोत्साहित किया जाता है।
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तबादले की प्रक्रिया में ‘मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर’ (MoP) का पूरी तरह पालन नहीं होता।
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इससे न्याय मिलने में देरी होती है क्योंकि नए जज को उस राज्य के स्थानीय कानूनों और मामलों को समझने में समय लगता है।
4. सुधार की राह: NJAC या कुछ और?
केंद्र सरकार ने 2014 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) लाने की कोशिश की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था। अब फिर से बहस छिड़ी है कि क्या:
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कॉलेजियम में एक ‘सर्च एंड इवैल्यूएशन कमेटी’ होनी चाहिए?
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क्या जजों की संपत्ति और उनके फैसलों के डेटा को नियुक्ति का आधार बनाना चाहिए?
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क्या नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका (정부) की सीमित भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए?
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