नई दिल्ली. भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के बीच प्रस्तावित व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच, यह समझौता भारत की ‘लुक वेस्ट’ नीति और खाड़ी देशों के आर्थिक विविधीकरण के बीच एक मजबूत कड़ी साबित होने वाला है।
प्रमुख विकास और वक्तव्य
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस वार्ता को भारत-जीसीसी संबंधों में एक “महत्वपूर्ण मील का पत्थर” बताया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि साझा सांस्कृतिक इतिहास और आर्थिक पूरकता के कारण यह समझौता दोनों पक्षों को नई गति प्रदान करेगा।
वहीं, जीसीसी के महासचिव जसीम अलबुदैवी ने कहा कि यह समझौता व्यवसायों के लिए ‘पूर्वानुमान और निश्चितता’ (Predictability and Certainty) सुनिश्चित करेगा, जिससे निवेश के प्रवाह में भारी बढ़ोतरी की उम्मीद है।
व्यापारिक आंकड़ों पर एक नजर (वित्त वर्ष 2024-25)
भारत और जीसीसी (सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन) के बीच आर्थिक साझेदारी नई ऊंचाइयों को छू रही है:
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कुल द्विपक्षीय व्यापार: $178.56$ अरब डॉलर।
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निर्यात बनाम आयात: भारत ने $56.87$ अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि $121.68$ अरब डॉलर का आयात (मुख्यतः तेल और गैस) किया गया।
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विकास दर: पिछले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार में औसतन 15.3% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है।
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निवेश: सितंबर 2025 तक जीसीसी देशों से भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 31.14 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है।
समझौते के संभावित लाभ
यह समझौता केवल वस्तुओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें कई आधुनिक आयाम शामिल होंगे:
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ऊर्जा सुरक्षा: भारत के लिए कच्चे तेल और एलएनजी की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित होगी।
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निर्यात विविधीकरण: इंजीनियरिंग सामान, चावल, वस्त्र और रत्न-आभूषणों के लिए खाड़ी देशों का $2.3$ ट्रिलियन डॉलर का बाजार खुलेगा।
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तकनीकी सहयोग: भविष्य की वार्ताओं में डिजिटल व्यापार, उभरती प्रौद्योगिकियों और सेवा क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
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मानवीय सेतु: खाड़ी देशों में रहने वाले 1 करोड़ भारतीय इस आर्थिक साझेदारी के सबसे बड़े आधार स्तंभ बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह एफटीए भारत को मध्य पूर्व में एक रणनीतिक बढ़त दिलाएगा और जीसीसी देशों को भारत की विशाल तकनीकी क्षमता और बाजार तक सीधी पहुंच प्रदान करेगा। आगामी महीनों में होने वाली वार्ताओं में सीमा शुल्क प्रक्रियाओं और निवेश प्रवाह को सुगम बनाने पर अंतिम सहमति बनने की उम्मीद है।
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