नई दिल्ली | मार्च 25, 2026 रक्षा डेस्क
भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने रक्षा क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक मील का पत्थर गाड़ दिया है। भारत के अपने ‘आयरन डोम’ कहे जाने वाले प्रोजेक्ट कुशा (Project Kusha) के तहत विकसित M1 इंटरसेप्टर मिसाइल का नवीनतम परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है। यह सफलता न केवल भारत की हवाई सुरक्षा को अभेद्य बनाएगी, बल्कि रूस के S-400 सिस्टम पर हमारी निर्भरता को भी पूरी तरह खत्म कर देगी।
3-लेयर सुरक्षा: 400 किमी तक कोई दुश्मन नहीं बचेगा
प्रोजेक्ट कुशा केवल एक मिसाइल नहीं, बल्कि एक मल्टी-लेयर एयर डिफेंस नेटवर्क है। नवीनतम जानकारी के अनुसार, इसे तीन अलग-अलग श्रेणियों में तैनात किया जा रहा है:
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M1 इंटरसेप्टर (150 किमी): लड़ाकू विमानों और क्रूज मिसाइलों के लिए काल।
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M2 इंटरसेप्टर (250 किमी): मध्यम दूरी के खतरों और दुश्मन के ड्रोन्स का सफाया।
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M3 इंटरसेप्टर (350-400 किमी): यह AWACS (जासूसी विमान) और रिफ्यूलर विमानों को सीमा पार ही ढेर करने की क्षमता रखता है।
क्यों खास है ‘प्रोजेक्ट कुशा’? (Key Highlights)
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स्वदेशी रडार तकनीक: इसमें ‘उत्तम’ (Uttam) एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) रडार का उपयोग किया गया है, जो स्टेल्थ (अदृश्य) विमानों को भी पकड़ने में सक्षम है।
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हाइपरसोनिक स्पीड: सूत्रों के मुताबिक, यह सिस्टम Mach 7+ की गति से आने वाले लक्ष्यों को भी इंटरसेप्ट कर सकता है, जो इसे दुनिया के सबसे तेज डिफेंस सिस्टम्स में से एक बनाता है।
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एक साथ कई निशाने: अत्याधुनिक कमांड और कंट्रोल सिस्टम की मदद से यह एक साथ 40 से अधिक लक्ष्यों को ट्रैक कर उन्हें नष्ट कर सकता है।
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आत्मनिर्भर भारत: इस सिस्टम में 90% से अधिक उपकरण स्वदेशी हैं, जिसे टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) के सहयोग से बनाया जा रहा है।
विशेषज्ञों की राय: > “प्रोजेक्ट कुशा के सफल परीक्षण का मतलब है कि अब भारत के पास अपना ‘नो-फ्लाई ज़ोन’ बनाने की क्षमता है। यह सिस्टम चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर तैनात होने के बाद भारतीय आकाश को पूरी तरह सुरक्षित कर देगा।”
S-400 बनाम प्रोजेक्ट कुशा: कौन है भारी?
| फीचर | S-400 (रूस) | प्रोजेक्ट कुशा (भारत) |
| अधिकतम रेंज | 400 किमी | 400 किमी तक |
| तकनीक | पुरानी/विदेशी | नवीनतम स्वदेशी AESA रडार |
| नेटवर्क | स्टैंडअलोन | IAF के ‘IACCS’ ग्रिड से पूरी तरह एकीकृत |
| रखरखाव | खर्चीला और विदेशी निर्भरता | सस्ता और पूर्ण स्वदेशी नियंत्रण |
आगे क्या?
DRDO के अनुसार, 2026 के अंत तक इस सिस्टम के यूजर ट्रायल (IAF द्वारा) शुरू होने की संभावना है। भारतीय वायुसेना ने पहले ही इसकी कई स्क्वाड्रन को शामिल करने की मंजूरी दे दी है, और 2028-29 तक इसे पूरी तरह तैनात करने का लक्ष्य रखा गया है।
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